राजनैतिक एवं प्रशासनिक कार्यप्रणालियों की विफलताओं से उपजे संकट की ओर संकेत कर ख़ुद व्यवस्था तथा आम आदमी को सचेत करना समाज के प्रबुद्ध वर्ग का ही काम है। वही अपनी भविष्य-दृष्टि का उपयोग करते हुए उन विफलताओं के भावी परिणामों की ओर ध्यान दिलाने का काम कर अपने दायित्व का निर्वहन करता है। अनामिका सिंह यहाँ अपने लेखकीय दायित्व का पूरी सजगता के साथ निर्वहन करती हैं और ग़ज़ल जैसी काव्य विधा के माध्यम से अपने समय की विसंगतियों की तरफ ध्यान आकर्षित करती हैं।
एक अच्छा रचनाकार वही है, जो हर वर्ग की कमियों को संतुलित दृष्टि के साथ देखता है। केवल ख़ामियों का सारा ठीकरा व्यवस्था के सिर फोड़ देने और भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी के नाम पर अँधा विरोध करने की बजाय इन संकटों के पीछे के कारणों पर मंथन कर उन कारणों में सहभागी समस्त कारकों को समान रूप से उजागर किया जाना ज़रूरी है। देश और समाज में उपजी समस्याओं के लिए समाज का आम आदमी भी उतना ही ज़िम्मेदार होता है, जितनी उस समाज की व्यवस्था। अनामिका सिंह अपनी ग़ज़लों में उस अंतिम पायदान के आदमी को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग करने का भरपूर प्रयास करती दिखती हैं।
यूँ तो अनामिका सिंह की ग़ज़लों में हर वंचित वर्ग के प्रति सहानुभूति मिलती हैं, लेकिन इनकी ग़ज़लों का सर्वाधिक सशक्त पक्ष महिला विमर्श है। इनकी ग़ज़लों का एक बड़ा भाग समाज की महिलाओं की स्थिति का यथार्थपरक अंकन, उनके प्रति हो रहे भेदभावों-अत्याचारों के चित्रण तथा उनकी संवेदनाओं के उद्घाटन से भरा है। एक महिला के जीवन से जुड़ा लगभग हर एक पहलु उनकी ग़ज़लों की कथा-वस्तु में समाहित होता है।
हमारे समाज में महिलाओं के प्रति लोगों के दृष्टिकोण तथा उनके साथ अपनाए जाने वाले रवैये के ख़िलाफ़ अनामिका जी बहुत बेबाकी के साथ अपना विरोध दर्ज करती हैं। यह विरोध उनके भीतर एक महिला होने के नाते आता है अथवा एक सजग रचनाकार, कहना मुश्किल है लेकिन जिस साहस, प्रबलता तथा वास्तविकता के साथ आता है, वह देखे जाने योग्य है।
उनकी रचनाओं में केवल स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ आक्रोश ही नहीं है बल्कि स्वयं स्त्रियों की सहनशीलता और कायरता पर हैरानी भी है कि वे क्यूँ सदियों से मूक बनी रहीं और अपने प्रति वह सबकुछ बर्दाश्त करती रहीं, जो किसी तौर बर्दाश्त किये जाने लायक नहीं। वहीं सदियों-सदियों से पिसती आ रही महिलाओं के लिए किसी ऐसे पुरुष की भी उपस्थिति खोजती हैं कि कोई है ऐसा, जो उनके लिए, उनके साथ खड़ा रह सके! उनकी मुश्किलों-दुविधाओं का हल बन सके! वे चौबीस घंटे की समय की घिरनी के बीच सुकून के दो पल भी तलाशती हैं, जिसमें एक महिला कुछ देर धूप मे सुस्ताने लिए समय निकाल सके, एक कप चाय की चुस्की ले सके अथवा कुछ देर मन की कोई किताब पढ़ सके।
हम कह सकते हैं कि अब या पिछले कुछ दशकों में समाज में महिलाओं की स्थिति में बहुत बदलाव आया है। सही भी है लेकिन दूर-दराज अथवा निम्न वर्ग की महिलाओं की स्थिति आज भी कम बदतर नहीं है। उन महिलाओं के लिए शिक्षा, सजगता और सम्बल की आज भी उतनी ही ज़रूरत है।
महिलाओं के अलावा अनामिका सिंह जी की ग़ज़लों में दलित, किसान, पहाड़, पुरुष आदि के पक्ष में भी रचनाएँ मिलती हैं। हिन्दी ग़ज़ल में किसान एवं प्रकृति से संबंधित रचनाएँ तो बहुतायत में मिलती हैं लेकिन दलित तथा पुरुष चेतना की रचनाएँ न के बराबर हैं। इनके पास पूरी की पूरी ग़ज़लें हैं। इसी प्रकार केवल पहाड़ और उसके परिवेश पर भी ग़ज़लें देखने को मिलती हैं। कहा जा सकता है कि अलग तरह की विषयवस्तु, कहन तथा भाषा ही अनामिका सिंह की ग़ज़लों का वैशिष्ट्य है।
विशिष्ट और अपनी तरह की कहन अनामिका जी की ग़ज़लों में जगह-जगह देखने को मिलती है। वे बात को साधारण ढंग से कहने की बजाय कुछ अलग तरह से प्रस्तुत करती हैं और इस प्रकार वे अपने शेरों को अपने समय के ग़ज़ल लेखन से थोड़ा अलग खड़ा कर देती हैं। कहन का यही अलग ढंग इनके गीतों में भी बराबर देखने को मिलता है।
अनामिका सिंह की ग़ज़लों में यथार्थ की अतिशयता की वजह से खुरदुरापन देखने में आता है, जो ग़ज़ल के पारंपरिक ढंग से मेल नहीं खाता और इसी कारण पारंपरिक ग़ज़ल के ग्राहकों की आँखों में चुभता भी है। लेकिन इसी खुरदुरेपन के कारण वे ग़ज़ल में अपनी बात इतनी प्रबलता के साथ कह पाती हैं कि वह पाठक के मानस-पटल पर हथौड़े की चोट की भांति पड़, उसे विचलित कर सके। दरअसल छैनी-हथौड़ी से पत्थर को तराशने वाला समय हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं। अब हमारे भीतर की जड़ता जम-जम कर पहाड़ का रूप ले चुकी है और उस पहाड़ को दरकाने के लिए बड़े हथौड़ों ही की दरकार है। हिन्दी ग़ज़ल के उद्भव के पीछे भी शायद यह एक कारण रहा है। दुष्यंत, अदम, रामकुमार कृषक, हरेराम समीप, डी० एम० मिश्र, महेश कटारे सुगम और नज़्म सुभाष जैसे तेज़-तुर्श ग़ज़लकार समय की ज़रूरत हैं, अनामिका सिंह भी उसी ज़रूरत की पूर्ति दिखाई पड़ती हैं। हाँ, महिलाओं में इतना तीक्ष्ण स्वर लिए यह पहला नाम दिखाई पड़ता है। चुभन की शायद यह भी एक वजह हो।
इनकी ग़ज़लों की यह तुर्शी-तीक्ष्णता जान-बुझकर धारण की हुई है। मेरी उपरोक्त बात शायद रचनाकार स्वयं भी जानती हैं और इसी कारण उन्होंने अपनी कहन को तराशकर चिकना-सपाट नहीं बनाया। हालाँकि ऐसा नहीं कि पारंपरिकता वाली ख़ूबसूरत कहन का सलीक़ा इनके पास नहीं है, है लेकिन वो इनके काम का नहीं, यह बात वे जानती हैं। वे जानती हैं कि उनके हाथ इससे भी मज़बूत एक उपकरण है- तल्ख़-कहन। वे एक शेर में कहती भी हैं-
इनके ख़ूबसूरत कहन के कुछ शेर भी देखिए, जो मेरी उपरोक्त बात की पुष्टि करते हैं-
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अनामिका सिंह हिन्दी ग़ज़ल के परिसर में एक धमक के साथ प्रविष्ट हुई हैं। एक ऐसी धमक, जो सबकी नज़रें- सबका ध्यान सहज ही अपनी ओर खींचती है। उनकी ग़ज़लें, उनके शेर बहुत संभावनाएँ भी जगाते हैं और बड़ी उम्मीदें भी बँधाते हैं। अनामिका जी चूँकि अनुभवी और सजग रचनाकार हैं, सो आशा की जा सकती है कि वे लेखन की अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत रहेंगी और अपनी तरफ से अच्छा कर पाने के हर संभव प्रयास करेंगी ताकि हिन्दी ग़ज़ल तथा हमारे समय का साहित्य समृद्ध हो सकें। संग्रह 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' के लिए उन्हें मन भर बधाई और शुभकामनाएँ।
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