यह सच है कि ग़ज़ल ने जिस तरह हमारे यहाँ लोगों की भावनाओं को छुआ है, उस तरह कोई और साहित्यिक विधा ये काम नहीं कर पायी। हालाँकि कहानी, कविता और कई छांदस विधाओं ने पाठकों के मन में जगह बनाई है लेकिन जो जगह ग़ज़ल की है, वो शायद किसी की नहीं। इसके कारणों में शायद ग़ज़ल की आम-फ़हम भाषा रही हो या उसकी लयात्मकता अथवा उसका आम जीवन के बेहद क़रीब होना, जो भी हो लेकिन ग़ज़ल और उसके शेर आम लोगों के मन से एक अलग जुड़ाव रखते हैं, इसमें कोई शक-गुंजाइश नहीं।
मंजुल निगम रवायती नगर लखनऊ से आयीं शायरा हैं, जिनकी ग़ज़लों में आज की ग़ज़ल की सारी ख़ूबियाँ मौजूद हैं। वही उर्दू मिश्रित आम-जन की भाषा और वही दिल छूने वाले अह्सास। अपने नव प्रकाशित संग्रह मुंतज़िर हूँ मैं की ग़ज़लों के ज़रिए वे पाठकों तक पहुँचती हैं। संग्रह की कुल एक सौ ग़ज़लें पढ़कर हम यह भली-भांति जान लेते हैं कि मंजुल निगम जी के पास एक अच्छी शायरा होने के तमाम गुर मौजूद हैं।
ग़ज़ल कहते समय वे रवायत का पूरा ध्यान रखती हुई हमारे दौर पर भी बराबर नज़र बनाए रखती हैं। उनकी ग़ज़लों में पारंपरिकता पूरी तरह मौजूद होने के साथ सम-सामयिकता भी देखने को मिलती है। दुनिया को देखने-समझने का अपना एक नज़रिया है इनके पास और उसी के दम पर वे अपने शेरों को बुनती हैं। जीवन-दर्शन के अलावा सरोकार तथा प्रेम इनकी ग़ज़लों का मुख्य कथ्य बनते हैं।
जीवन और उसकी समझ उर्दू की ग़ज़ल के कथ्य का महत्वपूर्ण बिंदु है। एक इंसान के जीवन से जुड़ी वे तमाम बातें, जो किसी भी साधारण पाठक को अपनी-सी लगती हैं, उर्दू की ग़ज़ल में पूरी धमक के साथ मिलती हैं। शताब्दियों से उर्दू की ग़ज़ल की सफलता का यही कारण है कि वह वही सब बयान करती है, जो एक सामान्य इंसान सुनना-पढ़ना पसंद करता है।
दुनिया की समझ मंजुल निगम जी की भी बड़ी परिपक्व है। वे अपनी नज़र से दुनिया-जहान को देखती-समझती हैं और अपनी तरह से उसे शेरों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं-
आने वाला कल भी केवल
कल भर का मेहमान रहेगा
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हलचल कर दे मन के जल में
ईर्ष्या ही वो इक कंकर है
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रुख़सत हुए हैं लोग जो दुनिया से एक बार
फिर वापसी का उनकी कोई रास्ता नहीं
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'मंजुल' उड़ान कितनी भी ऊँची रहे मगर
हासिल नहीं हुआ है किसी को भी आसमान
पारंपरिक रंग की इनकी शायरी के बीच कहीं-कहीं उनका समय और उस समय से जुड़े हुए सरोकार-सन्दर्भ भी झाँकते हुए-से मिलते हैं। ये सरोकार, ये सन्दर्भ हमें रचनाकार के सतर्क तथा सचेत होना का पता देते हैं। प्रस्तुत तीनों शेरों में हमारे समाज का बदलता ढंग और उसकी चिंताएँ मौजूद हैं-
कद्र लोगों को कुछ नहीं मेरी
जैसे बूढ़ों का मश्विरा हूँ मैं
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चाँद तक पहुँचा है बेशक इस जहां का आदमी
पर हुआ ख़ुद से जुदा है, ये ख़बर अच्छी नहीं
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सरगर्म झूठ की है तिजारत हर एक ओर
मंजुल जी अपने दौर की विषम स्थितियाँ हमारे सामने रखती हैं। उन स्थितियों से उत्पन्न होने वाली विकृतियों के बाबत आगाह भी करती हैं, उनके पीछे के कारणों का खुलासा भी करती हैं और उन स्थितियों के सुधारे जाने के उपाय भी सुझाती हैं। एक अच्छा रचनाकार अपनी दिव्य-दृष्टि से परदे के आर-पार देखकर अपने समय और समाज को लगातार सचेत करता चलता है। मंजुल निगम भी अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपने रचनाकार के दायित्व का निर्वहन करती दिखती हैं-
किस तरह हम सुकूं तलक पहुँचें
पाँव जब ख़्वाहिशों ने पकड़े हैं
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हर किसी का साथ देना थी कभी तहज़ीब जो
ढूँढ़कर मैं थक गया हूँ उस ख़ुलूसी के निशां
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अपनी रफ़्तार कुछ करें धीमी
ख़ुद को भी दस्तयाब हो जाएँ
ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारणों में एक कारण उसमें नाज़ुक अहसासों की अभिव्यक्ति भी रहा है। हमारे यहाँ का लगभग हर एक ग़ज़ल प्रेमी, ग़ज़ल में मिलन और विरह के शेरों के साथ एक अलग तरह का जुड़ाव अनुभव करता है। इस जुड़ाव के कारण अपने मन के भावों को शब्द देने वाले शेर अक्सर पाठकों की ज़ुबान पर चढ़े फिरते हैं। मंजुल निगम जी की ग़ज़लों में भी प्रेम पूरी शिद्दत के साथ उपस्थित मिलता है। यहाँ प्रेम की सुनहरी यादें भी हैं और उसकी प्रौढ़ समझ भी-
दिल का अह्सास दिल समझता है
क्या ज़रूरत इसे जताने की
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बिन तेरे दिल कहीं नहीं लगता
बिन तेरे है भी इस जहान में क्या
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महके-से वो लम्हे थे तेरे साथ जो गुज़रे
फिर वक़्त कभी वैसा मुअत्तर नहीं देखा
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तेरे पहलू में जो भी गुज़रा है
लम्हा-लम्हा वो बाकमाल रहा
लखनऊ (उ०प्र०) के बीएफसी पब्लिकेशन से वर्ष 2025 में प्रकाशित मंजुल निगम जी की पुस्तक 'मुन्तज़िर हूँ मैं' ग़ज़ल प्रेमियों के लिए सरस और पठनीय होगी, ऐसा इसे पढ़ने के बाद आभास होता है। इनकी सादा-सरल ज़ुबान और सहज कहन ग़ज़लों से पाठकों को जोड़ने में सफल हो सकेंगी, इसी कामना के साथ उन्हें संग्रह के प्रकाशन की बधाई और उसकी सफलता के लिए शुभकामनाएँ।

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