समाज के अंतिम पायदान के आदमी के पक्ष में खड़े इस कवि की रचनाओं में यह हरारत जगह-जगह दिखलाई पड़ती है। अनवर साहब हमारे समाज के निम्नवर्गीय जीवन से बहुत अच्छी तरह परिचित भी हैं। ख़ुद अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, इसलिए उस समुदाय की अच्छाइयों, बुराइयों से भलीभांति वाकिफ़ हैं। अच्छी बात यह है कि वे एक तरफा सोच अथवा विचारधारा के समर्थक नहीं हैं। अपने कहानी संग्रह 'गहरी जड़ें' में इन्होने अल्पसंख्यक समुदाय का जो ताना-बाना प्रस्तुत किया है, उसे देख- समझकर यह स्पष्ट हो जाता है कि रचनाकार सच का पक्षधर है, जो रूढ़ियों अथवा जड़ मानसिकता पर टूटकर प्रहार करता है। इसी तरह वे कोयला खदान के जीवन और उसके परिवेश को बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं, क्योंकि उसी के इर्दगिर्द इनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा नौकरी करते हुए बीता है। वहाँ के परिवेश में सर्वहारा, समाज का अंतिम व्यक्ति अथवा कहें निम्नवर्गीय जीवन उनके बहुत क़रीब रहा है। अतः उनके लेखन में वह वर्ग प्रामाणिकता के साथ क्यूँ दर्ज होता है, यह समझा जा सकता है।
वंचित वर्गों के लिए गहनता से विचार करता यह कवि जानता है कि उसके जीवन-स्तर के सुधारों में कहाँ अड़चनें हैं। ये अड़चनें चाहे व्यवस्था के स्तर पर हों, चाहे पूँजीवाद के अथवा चाहे ख़ुद उस ही के द्वारा निर्मित की हुईं, अनवर सुहैल साहब के रचनाकार को व्यथित होने तक परेशान करती हैं। राजनीति किस प्रकार आधी सदी से अधिक समय से इस वर्ग से छल करती आयी है, वे जानते हैं। और शायद इस छल को यह वर्ग भी जानता है लेकिन 'भगवान' पर किसका ज़ोर चलता है-
और शायद इसीलिए कवि इस वर्ग को अहसास करवाता हुआ कहता है कि तुम किस भ्रम में हो! यहाँ सारी सुविधाएँ, सारे ईजाद 'भगवान' के लिए होते हैं, न कि 'भोले भक्तों' के लिए-
इस 'भगवान-भक्त' वाली व्यवस्था के प्रति सवाल उठते हैं। हर समय में असंतोष होता है। सवाल उठना या असंतोष होना उतना ही सहज है, जैसे प्रकृति में अन्य काम होते हैं। सूरज का उगना, चाँद का निकलना, फूल का खिलना या किसी ऋतू का आना-जाना। लेकिन इन सवालों का कोई उत्तर नहीं है। न था, न है और न होगा। 'न होगा' की टूटी हुई उम्मीद से भी कवि परिचित है। वह जानता है कि सवालों के साथ जब इतनी पीढ़ियाँ खप गयीं, तो यह भी खप जाएगी। ये सवाल भी दफ्न हो जाएँगे।
उनका मानना है कि इस वर्ग की पीड़ा को यही वर्ग समझ सकता है। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि इस व्यवस्था में बदलाव की गुंजाइश अगर कहीं है, तो इसी वर्ग में है।
लेकिन अफ़सोस कि यह वर्ग हमेशा से यही मानता रहा कि उसके कंधों की सलीब को ढोने के लिए, उसके दुखों का भार हल्का करने के लिए आसमान से उतरकर कोई आएगा और एक दिन सब ठीक कर जाएगा। शायद हर धर्म, हर सभ्यता ने यही आश्वासन दिया है उसे। इस आश्वासन के दम पर उसने जाने कितनी सदियाँ बिता दीं और ख़ुशी-ख़ुशी बिता दीं।
और छल की इन्तेहा देखिए कि उस 'तारणहार' के भेष में कितने ही आये और इस वर्ग को भरमाते रहे। स्वप्न दिखाकर उनकी लहुलुहान ताबीर थमाते रहे। शेष रह गया तो उस 'तारणहार' का आना और उसके आने का आश्वासन इस उलाहने में बदल गया कि 'इब्ने-मरियम तुम आये नहीं'। यही उलाहना, यही इंतज़ार इस कविता संग्रह का शीर्षक बन जाता है। शीर्षक, जो अपने भीतर कितनी ही निराशा, कितनी ही टीस लिए हुए है!
अनवर सुहैल का रचनाकार हमारे दौर की नई करवट के प्रति भी बेचैन दिखाई पड़ता है। यह दौर जिस तरह की नई आहटें लेकर आया है और जिस तरह के निशान छोड़ता हुआ जा रहा है, उससे कवि के भीतर एक अजीब प्रकार की हताशा उभरी है। यह हताशा सब बेह्तर होने के एक लम्बे इंतज़ार के बाद उतने ही बुरे हासिल से पैदा हुई एक प्रतिक्रिया है शायद। यह हताशा कवि की अपनी कम है, उन वर्गों की ज़्यादा है, जिन्हें बराबर वंचना और शोषण का शिकार होना पड़ा है। संग्रह की अलग-अलग कविताओं में यह हताशा कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त होती है-
यह सच है कि यह दौर कुछ अधिक विकट है लेकिन हर समय, हर युग में कमोबेश ऐसी ही स्थितियाँ-परिस्थितियाँ रही हैं, जब सच पर सौ प्रकार के हमले होते हैं और झूठ का अपना वर्चस्व रहता है। दरअसल झूठ, बल, भय, हिंसा, कपट ऐसे उपकरण हैं, जो नियंताओं ने हमेशा अपने हाथों में रखे हैं ताकि इनकी बदौलत वे अपना दबदबा, अपना रौब-दाब बना के रख सकें। पर वे नियंता यह भूल जाते हैं कि ये ही उपकरण एक दिन 'बैकफायर' भी कर जाते हैं और उन्हीं के पतन का कारण भी बनते हैं। झूठ या छद्म अंततः मिट्टी में ही मिला हुआ दीखता है और जीत की पताका सच के हाथों में ही थमी रहती है।
कविता संग्रह 'इब्ने-मरियम तुम आये नहीं' अपने समय की बेबाक अभिव्यक्ति है। इसकी कविताएँ हमारे दौर की कई ज़रूरी हलचलों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। पूरे संग्रह की कविताओं में एक बेचैनी, एक छटपटाहट पसरी हुई मिलती है। कविताओं के विषय ज्वलंत और भाषा-शैली कविताओं के स्वभाव के अनुरूप है। हाँ, रचनाकार के अनुभव को देखते हुए कहन में परिपक्वता की थोड़ी और उम्मीद की जा सकती है। यह ऐसा पक्ष है, जिस पर मेहनत की गुंजाईश दिखती है। पुस्तक का आवरण बहुत अच्छा है और प्रकाशन का काम भी अच्छा हुआ है।

के पी अनमोल जी ने सचमुच कवि के दिल किनारों को भी आम किया है।आभार।
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