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Friday, July 8, 2016

एक ज़मीनी सितारे की सदाओं को आसमां तक पहुँचाता मजमुआ: आसमां तक सदा नहीं जाती





शायरी का परिचय जब महलों से, महबूब की जुल्फों से निकलकर आम ज़िन्दगी से हुआ तो रास्ते में उसे बड़े-बड़े फ़नकार मिले, जिन्होंने उसका हाथ थामकर, उंगली पकड़कर बहुत करीने से ज़माने की हर तंग गली से गुजारा और बड़ी नज़ाकत से संवारा। शायरी के उन्हीं आधुनिक पैरोकारों की अगली नस्ल में एक और नाम जुड़ रहा है, जो ग़ज़ल के मिज़ाज को और ख़ूबियाँ देने में हर तरह से क़ाबिल है।
यह नौजवान शायर इतनी कमसिनी में भी ऐसी ज़हीन बातें कह जाता है कि एकबारगी इसकी उम्र पर शक़ होने लगता है। लेकिन यह सच है कि अनुभव उम्र के आंकड़ों से नहीं बल्कि दुनिया में खाये धक्कों से आता है। इस शायर ने कम उम्र में ही कई बड़े-बड़े धक्के खा लिये हैं कि इसे दुनिया के फ़ानी होने का अंदाज़ा बखूबी हो गया है। जोधपुर शहर में पला-बढ़ा यह शायर अपनी दृष्टी से न केवल पूरी दुनिया को देख आया है बल्कि चाँद-तारों के पार भी झाँक आया है, उनसे आँखें मिला आया है।
जी हाँ, सरताज अली रिज़वी उर्फ़ फ़ानी जोधपुरी की ग़ज़लों को पढ़कर यह सहज ही समझा जा सकता है कि ख़ुदा ने इन्हें दुनिया को देखने/समझने की कितनी बारीक नज़र अता की है। इनकी शायरी में एक नयापन है जो इन्हें आधुनिक ग़ज़लकारों की पहली सफ (पंक्ति) में खड़ा करने में सक्षम है।

इनकी ग़ज़लों का पहला मजमुआ हाल ही में जवाहर कला केंद्र, जयपुर के सहयोग से बोधि प्रकाशन, जयपुर से छपकर आया है ‘आसमां तक सदा नहीं जाती’। हालाँकि फ़ानी कई सालों से शायरी की दुनिया में अपना एक मुक़ाम रखते हैं।
सूरज पे छाँव का वार करना, पीठ पर रस्ता करना, काँच की बरसात में चलना, चाँद की किरणें खंगालना, धूप का ज़हर सोखना आदि बिम्ब/प्रतीक ऐसे गहने हैं, जिन्हें ये अपनी ग़ज़लों को पहनाकर अपनी शायरी की सुन्दरता को एक अलग ही श्रृंगार  देते हैं। कुछ ऐसे ही बिम्ब देखिये, जो सहज ही आँखों में उतर जाते हैं-

जहाँ तक है नज़र लफ़्ज़ों की है बिखरी हुई बालू
ग़ज़ल इससे चलो ऐ यार मुट्ठी भर बनाते हैं

सूरज के रुख पे धूप का क्या नूर आ गया
जो उठ रही है पानी की चादर ज़मीन से

ये झोंके आदमी के रंग में रंगने लगे शायद
तभी सोते हुए जिस्मों से चादर चाट लेते हैं

कहीं-कहीं ये बिलकुल ही नया प्रतीक लेकर खड़े मिलते हैं, जो आधुनिक शायरी की एक बड़ी मांग है। देखें-

मैं अपनी घुटन का हूँ एक पोस्टर
हवा के परों पे लगाना मुझे

उड़ती हुई पतंगों के लब पे थी ये सदा
सूरज पे आओ मिलके करें वार छाँव का

हू-ब-हू बेवा की उजड़ी मांग-सी
ये गली सूनी पड़ी है घर चलो

इस जहाँ के लिए जो हो फ़ानी
एक तस्बीह ऐसी फेरा कर

फ़ानी जोधपुरी बिलकुल आम बोलचाल की भाषा में बड़ी से बड़ी बात को आसानी से कह जाते हैं और यही एक वजह है कि पाठक इनकी ग़ज़लों को हाथो-हाथ लेता है। इनके पास कम से कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह जाने का मन्त्र है शायद। आप भी देखिये-

बाबा के कर्जे और मैं इक शाख पे पले
महका जो मैं तो मुझको चमन छोड़ना पड़ा
इस शेर के बहाने वो आज के मध्यम वर्ग के युवा की पीड़ा को कितनी आसानी से कह जाते हैं!

बारिश की बूँद-बूँद को तरसा किये मगर
इक मैक़दा अकेला कई घर भिगो गया
शराब से होने वाले नुक्सान को इससे ज्यादा असरदार तरीक़े से कोई क्या शायरी में कह पायेगा!

यूँ न ख़ुद को लहू-लहू करते
हम अगर पहले गुफ्तगू करते
एक छोटी-सी बात को सांप्रदायिक तूल देने से पहले दोनों पक्ष अगर इन दो मिसरों को समझ लेते तो शायद इंसानियत लहू-लहू होने से बच जाती।

इनकी शायरी में सोच का फ़लक भी बहुत विस्तृत है। वे जीवन के हर पहलू पर कलम चलाते नज़र आते हैं। ज़िन्दगी ने इन्हें छोटी-सी उम्र में ख़ूब आजमाया है और उस आज़माइश में ये तज़ुर्बे का एक नायाब ख़ज़ाना कमा लाये हैं, जो इनकी शायरी में भी ख़ूब झलकता है-

कमसिनी में ही ज़िन्दगी तुझको
तेरा घूंघट उठा के देख लिया

रंग दुनिया का मुझे दिखला दिया
ज़िन्दगी तूने बहुत अच्छा किया

दाग़ को भी जिस्म पे पहले कहीं महफूज़ कर
बाद में फिर चाँद जैसा जितना चाहे झिलमिला

हालांकि किताब की पहली ही ग़ज़ल के मक्ते में फ़ानी कहते हैं कि-

फ़ानी से ग़ज़लें इश्क़ की मुमकिन नहीं कभी
उम्मीदे-गुल न पालिए बंजर ज़मीन से

लेकिन जहाँ उन्होंने इश्क़ पर कुछ लिखा है, वो 'इश्क का इक मुकाम' पाने के बाद ही लिख पाना संभव है, जनाब इस विषय पर भी गहरे ख्याल रखते हैं, देखें-

तुम्हारे नाम को कागज़ पे लिखना
ग़ज़ल कहने की क़ुव्वत दे गया है

उस जगह बस तुझे-तुझे पाया
जिस जगह सोच हार जाती है

इनकी ग़ज़लों में सामयिक मसलों पर भी अशआर देखने को मिलते हैं। सही तो है जो रचनाकार अपने दौर को नहीं जीता, वो खाक़ जीता है! आज की तल्ख हकीक़त पर इनके कुछ शेर देखें-

पस्तियों से बाम तक दिखती नहीं है सीढ़ियाँ
दिख रहा है आदमी पे आदमी चलता हुआ

कुछ नए भगवान हैं इंसान को भटका रहे
फिर यहाँ दरवेश इक गौतम-सा होना चाहिए

फ़ज़ा में गूंजती है चीख कैसी
कोई आँचल कहीं मैला हुआ है

फकत इक दायरे में घूमती है
मगर क्या वक़्त भी बदला घड़ी से

एक सूफ़ियाना टच और कलंदरी इनकी ग़ज़लों में बारहा देखने को मिलती है, जो इनकी शख्सियत का भी इक अहम हिस्सा है। कुछ अशआर देखें-

या मेरी आवाज़ को मेरे गले में गर्क़ कर
या मेरी आवाज़ से आवाज़ तू अपनी मिला

एक मिटती लकीर जैसा हूँ
आदतन मैं फकीर जैसा हूँ

सबसे बड़ी बात यह है कि चाँद-तारों को छूने की उम्मीद बंधाता यह शायर पैरों से ज़मीन को नहीं छोड़ता। यक़ीनन फ़ानी जोधपुरी हिन्दुस्तान की शायरी में एक उभरता हुआ सितारा है। आज फानी कागज़ के कच्चे चेहरे पर ग़ज़लों के बहाने कुछ ऐसा लिख रहे हैं कि आने वाली पीढियां उसे सदियों तक नहीं भूल पायेंगी। बकौल फ़ानी-

आने वाली पीढ़ी जिसको भूल न पाए सदियों तक
कागज़ के कच्चे चेहरे पर कुछ ऐसा लिख जाते हैं

भाई फ़ानी जोधपुरी का ग़ज़लों का पहला मजमुआ पढ़कर ये विश्वास और पक्का हो जाता है कि फ़ानी कलम के कारीगर हैं। इनकी बेमिसाल ग़ज़लें पढ़कर सहसा मुँह से निकल पड़ता है-

है कौन सायबाँ तेरे सुखन का ऐ फ़ानी!
तेरे कलम से जो कारीगरी नहीं जाती






समीक्ष्य पुस्तक- आसमां तक सदा नहीं जाती
रचनाकार- फ़ानी जोधपुरी
प्रकाशन- बोधि प्रकाशन, जयपुर
संस्करण- प्रथम (2014)
मूल्य- 125 रूपये मात्र


(यह लेख अनंग प्रकाशन, दिल्ली से आई 'शोध-समीक्षा: विविध परिदृश्य' नामक पुस्तक में प्रकाशित है)