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Sunday, January 30, 2022

ग़ज़लकार की छिपी प्रतिभा का साक्षात्कार करवाता संग्रह: अधूरी हसरतें

 


इस समय की कविता में ग़ज़ल का आकर्षण लगभग हर रचनाकार को अपनी ओर खींच रहा है। ग़ज़ल एक ऐसी छांदस विधा है, जो अपने शायर को अपनी गिरफ़्त में लेकर उसे अपनी अभिव्यक्ति के लिए भावों का खुला आकाश देती है ताकि वह अपनी रचनाओं से हर ख़ास और आम के दिल को छू आये। ग़ज़ल के शेरों में सचमुच एक खिंचाव होता है, जो पाठक को भी बाँधता है।

झज्जर (हरियाणा) निवासी ग़ज़लकार मित्र सत्यवान सत्य जी भी ग़ज़ल में प्रेम में गिरफ़्तार हैं, जो स्कूली दिनों से लेखन का शौक़ रखते हैं। बीच में काफ़ी समय तक जीवन की जद्दोजहद में उलझकर लेखन रुका तो सही लेकिन परिस्थितियों के नियंत्रण में आते ही फिर यह शौक़ परवान चढ़ निकला। इस बार इंटरनेट एक मज़बूत सहारे के रूप में इन्हें मिला और नेट के ज़रिए इन्होंने अनेक उस्तादों और शायरों की संगत में अपने लेखन को ग़ज़ल की दुनिया में प्रवेश कराया।

कुछ समवेत संकलनों के बाद ग़ज़ल विधा की इनकी यह पहली पुस्तक है। 'अधूरी हसरतें' नामक इस संग्रह में संग्रहीत इनकी 101 ग़ज़लें रचनाकार का शुरुआती लेखन होने के बावजूद इनके भीतर छिपी प्रतिभा का साक्षात्कार करवाने में सक्षम हैं। आरम्भ के समय के हर ग़ज़लकार की तरह सत्यवान सत्य जी भी हालाँकि पारंपरिक ग़ज़ल लेखन एवं उर्दू भाषा के आकर्षण में बँधे दिखते हैं लेकिन कुछ शेर ऐसे मिलते हैं, जो इनके वास्तविक स्वभाव से परिचय करवाते हैं। यह एक ऐसे रचनाकार का स्वभाव है, जो हमारे आसपास घटित होते हर भले-बुरे के लिए चिंतित एवं सचेत है। इन शेरों में ये अपने समय की ज़रूरी अभिव्यक्ति देते हुए अपनी रचनाधर्मिता का दायित्व वहन करते हैं। इनके शेरों में कहीं-कहीं हिन्दी के शब्दों का भी बहुत सुंदर प्रयोग मिलता है।

कोरोना महामारी के दौरान जब सारा देश रुका हुआ था। भागती-दौड़ती दुनिया अचानक ठहर गयी थी। बाहर निकलना, मिलना-जुलना सब बंद था। ऐसे में पाबन्दियों के दिनों की एक वास्तविक अभिव्यक्ति देखिए, जो यह स्पष्ट करती है कि रचनात्मक लोग ऐसे बुरे दौर में भी किस तरह आज़ाद रहे-

दर भले ही ज़िंदगी के बंद हैं
पर ख़यालों से तो हम स्वच्छंद हैं

कोरोना-समय की बंदिशों पर ही लगभग झुंझलाहट भरा यह शेर, उस दौरान हर एक शख्स़ की भावनाएँ होकर सामने आता है। सच है, पाबंदियाँ भी एक हद तक झेली जा सकती है।

बला जाने ये कब उतरेगी सर से
निकलना हो गया मुश्किल ही घर से

इसी समय पर एक समझदारी भरी बात कहते हुए, एक बहुत अच्छी नसीहत देते हुए सत्यवान सत्य जी कहते हैं-

बचेंगे तो कहेंगे हाल यारो
अभी सर पर है अपने काल यारो

गुज़र कर लो जो कुछ रक्खा है घर में
उड़ाएँगे कभी फिर माल यारो

रचनाकार अपने जीवन से हासिल अनुभवों को ही मथकर अपनी रचनाओं का सृजन करता है। ये रचनाएँ एक सामान्य इंसान तथा पाठक को अपने जीवन में सजग रहने के लिए सचेत भी करती हैं और कुछ अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित भी करती है। यदि एक रचनाकार अपने समग्र लेखन के ज़रिए केवल एक इंसान को ही प्रभावित कर उसका जीवन बना सके तो यह उसकी उपलब्धि होगी। हमारे बीच भी ऐसे कई-कई लोग होंगे, जो कुछेक पंक्तियों से प्रोत्साहित हो, अपने लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। सत्यवान जी की ग़ज़लों में भी अनुभव जनित कई शेर देखने को मिलते हैं। कुछ शेर देखिए-

हज़ारों आबले पैरों में बनकर फूट जाते हैं
मुसाफ़िर तब कहीं जाकर किसी मंज़िल से मिलता है
_____

यकीं ख़ुद पर अगर करता, मशक्कत जारी रखता तो
किसी इंसान के हाथों में फिर कासा नहीं होता
_____

ज़ुल्म के ये सिलसिले बस बर्फ के पर्वत-से हैं
बह चलेंगे सामने इनके अगर डट जाएगा

अनुभव जनित एक और शेर देखिए, जो जीवन का फ़लसफ़ा बहुत आसान-से, बातचीत के लहजे में समझाता है-

जीवन क्या है उससे पूछो
जो दुख से दो-चार हुआ है


ऐसे लोग, जो जीवन में किसी भी क्षेत्र में असहमति दर्ज नहीं करवा पाते और हर बात में हामी भरने वालों को उकसाते हुए उन्हें गुलाम की संज्ञा देते हुए अतिवाद का विरोध जताने के लिए प्रेरित करते हैं, अपने इस शेर के माध्यम से-

सिर्फ हामी सिर्फ हामी सिर्फ हामी
कब तलक बोलो करोगे यूँ गुलामी

चारों तरफ बढ़ते हुए आपसी वैमनस्य, अलगाव पर चिंतित होते हुए रचनाकार यह बताते हैं कि अगर इसी तरह हम एक-दूसरे से धर्म, जाति, भाषा आदि के नाम पर दूर होते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब धरती क्या, आसमान तक नफ़रतों से पट जाएगा। सीधे-सीधे रचनाकार यह कहना चाहते हैं कि आख़िर कब तक हम इस तरह लड़ते रहेंगे! इस नफ़रत का अंत कब होगा!

आदमी से आदमी गर इस तरह कट जाएगा
नफ़रतों की धूल से फिर यह फ़लक पट जाएगा

आये दिन हम देखते हैं कि हमारे देश में प्राकृतिक आपदाओं और दुर्घटनाओं के समय जब आम इंसान अपनी जान बचाने के लिए संघर्षरत होता है। ऐसे में भी हमारे देश के राजनेता तथा अन्य कुटिल लोग अपनी राजनीति चमकाने में लगे होते हैं। ऐसी स्थिति पर दुखी होकर एक संवेदनशील रचनाकार इससे अधिक भला क्या कह सकता है-

जो मुसीबत में सियासत कर रहा है
वो यक़ीनन होगा आदमखोर कोई

उपरोक्त संग्रह की कई रचनाएँ अपनी भाषा, शैली तथा वर्ण्य विषय के आधार पर हिन्दी की जन सरोकार की कविता का आभास कराती है। लेकिन अधिकतर रचनाएँ ग़ज़ल की पारंपरिक रचनाओं से प्रभावित दिखती है या अभ्यास के उद्देश्य से कही गयी रचनाएँ दिखती हैं। मुझे यह विश्वास है कि रचनाकार का जन सरोकार से गहरा नाता है और वही उन्हें आम बोलचाल की भाषा की प्रभावशाली ग़ज़लें लिखने के लिए प्रेरित करता है। यदि रचनाकार हमारे यहाँ की कविता की परंपरा का कुछ अध्ययन कर सकें तो सार्थक लेखन में अच्छा स्थान बना सकते हैं।





समीक्ष्य पुस्तक- अधूरी हसरतें
रचनाकार- सत्यवान सत्य
विधा- ग़ज़ल
प्रकाशक- जिज्ञासा प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद
संस्करण- प्रथम
मूल्य- 200 रुपये


Saturday, June 5, 2021

ज़मीनी आदमी के जीवन/समाज के भले-बुरे को शब्दबद्ध करती ग़ज़लें




कुछ समय पहले सुरेश पबरा 'आकाश' जी का ग़ज़ल संग्रह 'वो अकेला' मिला। यह उनका पहला प्रकाशित संग्रह है, जो पहले पहल प्रकाशन, भोपाल से आया है। इस संग्रह में कुल 68 ग़ज़लें संग्रहित हैं। सुरेश पबरा जी दुष्यंत कुमार की ग़ज़लगोई से प्रभावित हैं और उन्हीं की तरह आम आदमी के दुःख को अपनी ग़ज़लों में बाँधने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार, "हिन्दी ग़ज़ल केवल मनोरंजन ही नहीं कर रही, बल्कि समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रही है।" बात सोलह आने सच है।

यह संग्रह पढ़ने बाद कहा जा सकता है कि इनकी ग़ज़लें वर्तमान समय की बेबाक अभिव्यक्ति है। पुस्तक के रचनाकार सुरेश पबरा जी कभी सत्ता, कभी समाज तो कभी ख़ुद को अपनी कमियों के लिए लताड़ते हैं। यानी एक रचनाकार के रूप में वे पूरी तरह से सजग हैं। समाज और अपने आसपास को सचेत करते रहने का गुण ही तो हिंदी ग़ज़ल के प्रमुख गुणों में एक है। सुरेश पबरा जी अपनी ग़ज़लों के ज़रिए यह काम बा-ख़ूबी करते हैं-

शराफ़त से सहना ग़लत बात को
मियां बुज़दिली है शराफ़त नहीं

********

तुम ग़लत हो इसलिए सहमे हुए हो
वो नहीं डरता किसी से जो सही हो

इनकी ग़ज़लें सामान्य आदमी की अपनी भाषा और परिवेश की ग़ज़लें हैं। बिना किसी भारी शब्द का इस्तेमाल किये; वे एक सामान्य आदमी के जीवन से जुड़े अनुभवों और भावों को अपने शेरों में पिरोते हैं।

होते हैं आदमी के जैसे दिन
वैसा उसका लिबास होता है

********

आज अगर थम जाए बारिश तो धनिया को काम मिले
काम नहीं कल मिल पाया था भटका दिन भर बारिश में

अपनी ग़ज़लों में पबरा जी कहीं-कहीं मुहावरों का भी ख़ूबसूरती से प्रयोग करते हैं। 'दुखों का दादरा गाना', 'चुल्लू भर पानी में डूबना', 'पंगा लेना' जैसे मुहावरे हमें उनके शेरों में दिखाई पड़ते हैं। हिंदी ग़ज़लों की पहचान ही यही है कि उसमें हिंदी कविता के भाषाई संस्कार दिखलायी पड़ते हैं।

सुरेश पबरा 'आकाश' जी की सीधी-सपाट अभिव्यक्ति की ग़ज़लों में कहीं-कहीं प्रतीकात्मकता के भी दर्शन होते हैं। प्रतीकात्मकता ग़ज़ल ही नहीं, सम्पूर्ण कविता का महत्वपूर्ण गुण है। हालाँकि हिंदी की ग़ज़लें अक्सर ही बहुत सपाट होती दिखती हैं। कविता के इस दौर में सपाटबयानी भी ज़रूरी है लेकिन प्रतीकात्मकता की अपनी अहमियत है।

क्या बर्फ थी गर्मी मिली फ़ौरन पिघल गयी
मौका मिला तो आपकी नीयत बदल गयी

तू ही बता दे किस तरह पाएगा वो पतंग
जब डोर उसके हाथ से कब की फिसल गयी

आज हर ओर स्वार्थ हावी है। चाहे वह समाज का कोई भी क्षेत्र हो, पूछ पैसे और पद की है। व्यक्तित्व और भावनाओं से किसी को सरोकार नहीं। हर कोई स्वार्थवश समर्थ व्यक्ति के आसपास इस उम्मीद से मंडराता है कि किसी तरह उसकी कोई साध पूरी हो जाए। मधुमक्खियों को फूलों की रंग-सुगंध से क्या सरोकार! उन्हें केवल रस चाहिए होता है। वह मिल गया फिर जय राम जी की। समाज में दिखलाई पड़ते इस तरह के दृश्यों को शब्द देकर रचनाकार कुछ इस तरह यथार्थ बयान करते हैं-

कितना छोटा आदमी था वो मगर
कितना ऊँचा कर दिया पद ने उसे

अक्सर यह देखा गया है कि इंसान के लिए अच्छी आदतों को अपनाना बहुत मुश्किल होता है। वह चाहकर भी अच्छे इरादे, अच्छे काम नहीं कर पाता लेकिन ख़राब आदतें तुरन्त जीवन का हिस्सा हो जाती हैं और साथ ही उन्हें अपनाने में आनंद भी बहुत आता है। जबकि इंसान यह जानता है कि अमुक आदत उसके लिए नुकसानदायक है लेकिन वह अपनी इच्छाओं के आगे बेबस बना रहता है। यहाँ रचनाकार हमें सचेत करते हुए कहते हैं-

चीज़ जो हमको मज़ा देती है
ज़िंदगी में वो सज़ा देती है

********

मालूम है ये चीज़ सज़ा देगी किसी दिन
पर आज तो हम उसमें मज़ा ढूँढ रहे हैं

सुरेश पबरा जी की ग़ज़लें निम्न वर्ग और वंचितों की आवाज़ बनती दिखती हैं। इनके लेखन में सभी के कल्याण का भाव दृष्टिगत होता है, अम्न की चाहत दिखाई देती है। इनकी ग़ज़लें आज के समय का चित्रांकन करती हैं। यानी इनके लेखन में वे गुण हैं, जो उत्कृष्ट साहित्य की माँग होते हैं लेकिन अभी पबरा जी को अपनी ग़ज़लगोई पर और मेहनत की ज़रूरत है। एक रचनाकार समय के साथ धीरे-धीरे सीखता जाता है और इस तरह वह संपूर्णता की ओर बढ़ता है। पबरा जी को भी इस संपूर्णता के लिए अपना सफ़र जारी रखना चाहिए। अभी इनकी ग़ज़लों में कहीं-कहीं शिल्प ख़राब होता मिलता है तो कहीं क़ाफ़ियाबंदी दिखाई देती है। कहीं-कहीं कहन को तराश की ज़रूरत महसूस होती है।

ज़मीनी आदमी के जीवन/समाज के भले-बुरे को शब्दबद्ध करती ये ग़ज़लें अपने समय की अभिव्यक्ति है। यह संग्रह ग़ज़लकार की एक ईमानदार कोशिश है और इसीलिए यह पुस्तक सराहना के कुछ शब्दों की हक़दार है।




समीक्ष्य पुस्तक- वो अकेला
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- सुरेश पबरा 'आकाश'
प्रकाशन- पहले पहल प्रकाशन, भोपाल
पृष्ठ- 68
मूल्य- 200 रुपये (हार्डबाउंड)

Thursday, August 6, 2020

हिन्दी ग़ज़ल के परिवेश को मज़बूती से हमारे सामने रखता संग्रह 'चाँद छूने तक'


हिन्दी ग़ज़ल की एक ख़ासियत यह भी है कि यह ग़ज़ल विधा के दायरों में रहते हुए हिन्दी कविता-सा परिवेश रचती है। अपने रचाव में इसकी भाषा, कहन और शैली इस तरह अपने परिवेश को समाहीत करती है कि इसका अपना एक वातावरण निर्मित होता है। हिन्दी ग़ज़लकार यह वातावरण रचने में कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते बल्कि यह उनकी कविताई के स्वभाव में है। बोलचाल के शब्दों से अपने आसपास के परिवेश को शब्दबद्ध करते हुए कब ग़ज़ल; हिन्दी कविता के आँगन में आकर अठखेलियाँ करने लगती है, स्वयं इन ग़ज़लों के रचयिता यह अहसास नहीं कर पाते।
पिछले दिनों पढ़े गये ग़ज़ल संग्रह चाँद छूने तक को पढ़ते हुए यह विश्वास और मज़बूत हुआ। जोधपुर (राजस्थान) के बेह्तरीन रचनाकार दिनेश सिन्दल का यह संग्रह हिन्दी ग़ज़ल के अपने परिवेश को मज़बूती से हमारे सामने रखता है।

दिनेश सिन्दल राजस्थान सहित पूरे देश में मंच का एक प्रतिष्ठित नाम है। मंच पर इनके गीत, कविता और दोहों को धूम मचाते मैंने स्वयं देखा है। ग़ज़लों के अलावा इनके गीत और अन्य विधाओं की रचनाएँ भी उतनी ही सशक्त हैं। इसके साथ ही वे मंच और पत्रिकाओं/पुस्तकों में भी बराबर संतुलन बनाए रखते हैं। हाल ही वरिष्ठ हिन्दी ग़ज़ल आलोचक हरेराम समीप जी द्वारा उन्हें हिन्दी ग़ज़ल के अब तक के प्रमुख 104 नामों में भी शुमार किया गया है।

जहाँ इनकी ग़ज़लों की भाषा और परिवेश आकर्षित करता है, वहीं इनके शेरों के कथ्य में उपस्थित चिंताएँ तथा चिन्तन आश्वस्त करते दिखते हैं। इनकी ग़ज़लें आम इंसान की आसान-सी बोलचाल की भाषा में अपने समय का आईना बनकर उभरती हैं। इनके पास शब्द चयन और शब्द संयोजन की बहुत अच्छी समझ है, जो इनकी रचनाओं का ज़ायका बढ़ाती नज़र आती है। इनकी ग़ज़लों की भाषा के कुछ उदाहरण देखिए, मुहावरेदार भाषा और उत्कृष्ट प्रतीक योजना इनके शेरों को विशिष्टता प्रदान करती है-

पेड़ ने सुनकर लुटाये फूल-फल दो हाथ से
घाटियों में गा रही थी गीत संन्यासी नदी
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कौन सुनेगा नीचे स्वर में कुछ तो ऊँचा बोल ज़रा
तू भी इन नक्कारों के घर तूती के स्वर ले आया

भाषा के साथ-साथ एक अच्छी बात इनकी शायरी में यह देखने को मिलती है कि इनकी कहन प्रभावी है। अमूमन हिन्दी परिवेश की ग़ज़लों में सपाटबयानी अधिक देखने को मिलती है और इसे ग़ज़ल, जो 'इशारों का आर्ट' है, में एक बड़ी कमी माना जाता है। लेकिन दिनेश सिन्दल की कहन इनकी ग़ज़लों को और अधिक आकर्षक बनाती है। ये मुहावरों और प्रतीकों का प्रयोग करते हुए अपने शेरों को बहुत सलीक़े से रचते हैं।

मछलियों को ये पकड़ खा जाएँगे
चन्द बगुले ध्यान में डूबे हुए
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कैक्टस तो आप जब चाहे उगा लेंगे मगर
हाथ में काँटें चुभेंगे फूल इक बोते हुए
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अँधियारे ने सूरज को ये पाठ पढ़ाया कैसा है
तुम जब डूबो तो दुनिया पर पहले कुछ लाली करना

सामाजिक यथार्थ इनकी ग़ज़लों में यत्र-तत्र बिखरा मिलता है। ये अपने आसपास को बहुत बारीकी से देखते हैं और उसी बारीकी से उसे अपनी ग़ज़लों के शेरों में बाँधते भी हैं। इनकी लगभग हर एक ग़ज़ल में कोई न कोई सरोकार ज़रूर दिखाई पड़ता है। इस प्रकार दिनेश सिन्दल का रचनाकार अपने समाज के सरोकारों से गहराई से जुड़ा है।

एक चिड़िया ने लिखी सारी ज़मीनें आपकी
आपने चिड़िया को है क्या पंख भर अंबर दिया
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न जाने ज़िन्दगी ने क्या लिखा इनकी किताबों में
ये बच्चे वक़्त से पहले बहुत कुछ जान लेते हैं
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बच्चों की मनुहारें, पति की फटकारें
रूप बहुत हैं उस औरत के नर्तन के

दिनेश सिन्दल की ग़ज़लों में हमारा समय और समाज अपनी पूरी चकाचौंध के साथ उपस्थित मिलते हैं। इनकी लेखनी कभी अपनी परम्पराओं पर गर्व करती है तो कभी अतिवाद एवं विसंगतियों से मुठभेड़ करती दिखती है। एक साहित्यकार का यह दायित्व होता है कि वह ख़राब व्यवस्था तथा विसंगतियों के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़ा रहे और सामान्य जनमानस को उनके भले-बुरे के प्रति सचेत करता रहे। दिनेश सिन्दल अपनी ग़ज़लों में यह काम बाख़ूबी करते हैं।

बारिश, झरना, नदी, समुन्दर तेरे-मेरे जैसा सब
ज़िक्र नहीं पर तेरा-मेरा राजा की कविताओं में

आम आदमी चबा रहा है चने यहाँ पर लोहे के
और लिखा है समय सुनहरा राजा की कविताओं में
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है रियायत धर्म भी देता रहा इतनी यहाँ
आदमी कटना जहाँ था मैमना रखा गया

पहले जननी की ज़ुबां को खींच कर गूँगा किया
फिर यहाँ ऐ दोस्त 'वन्दे मातरम्' गाया गया

मुझे सिन्दल जी के आसपास रहने का भी मौक़ा मिला है और काफ़ी क़रीब से इन्हें जानने के प्रयास भी किये मैंने लेकिन इनके ग़ज़लकार और वह भी इतने प्रभावी ग़ज़लकार रूप का परिचय इस संग्रह के ज़रिये ही हुआ। कुछ समय पहले जब इनका संग्रह मिला और मैंने सरसरी तौर पर इसे देखा तो आश्चर्य हुआ। इसी उत्सुकता में व्यस्त दिनचर्या से समय चुराते हुए मैंने कई बार यह संग्रह पढ़ लिया। इस आश्चर्य की एक वजह यह भी है कि दिनेश सिन्दल जी अन्य साहित्यकारों की तरह आत्मप्रचार से दूर हैं। इतने समय के परिचय में इन्होंने कभी अह्सास नहीं होने दिया कि वे इतनी अच्छी ग़ज़लें कहते हैं। बल्कि इनके गीतों की स्तरीयता के बारे में मुझे बहुत पहले भान हो गया था और इस संबंध में मैंने इनसे बात भी की थी, शायद इन्हें याद हो। खैर देर से ही सही लेकिन एक अच्छे हिन्दी ग़ज़लकार के बारे में जानकार प्रसन्न हूँ। इनके पास कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिनकी हिन्दी ग़ज़ल को ज़रूरत है। जैसे भाषा की मिठास और कलात्मकता के माध्यम से यथार्थ की अभिव्यक्ति।

सिन्दल जी के अब तक छः ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। यह इनका नवीनतम संग्रह है। जोधपुर के रॉयल पब्लिकेशन से आयी इस पुस्तक में इनकी 114 ग़ज़लें सम्मिलित हैं। संग्रह की भूमिका में उर्दू ग़ज़ल के लोकप्रिय शायर राहत इन्दौरी कहते हैं- "दिनेश सिन्दल मुझे इसलिए अज़ीज़ हैं कि वो अपनी बिसात भर शेर जो अदब, ख़ास तौर पर हिन्दी ग़ज़ल की दशा और दिशा पर बात करते हैं। इसे सजाने-सँवारने और इसकी नौक पलक दुरुस्त करने की ख़्वाहिश और कोशिश में मसरूफ़ नज़र आते हैं।"

सचेत करते अनुभवजनित शेरों के साथ सिन्दल जी को इस पुस्तक के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ-

सतह पर तैरते हैं स्वार्थ सारे
बहुत गहरे कहीं पर भावना है
_________________

अनुभवों की दौलतें पायीं मगर
एक सिक्का उम्र का खोना पड़ा
__________________

सौंप कर जाएँगे आँखें हम उन्हें
पेड़ कुछ यूँ भी हरे रह जाएँगे
__________________

अँधियारे से लड़ना है तो केवल मन्दिर में ही क्यों
मन के आँगन में भी हमको दीप जलाना पड़ता है




समीक्ष्य पुस्तक- चाँद छूने तक
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- दिनेश सिन्दल
प्रकाशक- रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर (राज.)
संस्करण- प्रथम, 2019
मूल्य- 300 रुपये (हार्डबाउंड)

Sunday, March 22, 2020

इश्क़ के नीले रंग से सराबोर संग्रह: नीला नीला



आज हम बात करने वाले हैं मुहब्बत की और सोचिए मुहब्बत की बात शायरी की ज़ुबानी हो तो कैसा मज़ा होगा!
जी हाँ, नीले-नीले इश्क़ की बातें ग़ज़लों के ज़रिये बिलकुल अलहदा अन्दाज़ में करने के लिए हमसे मुख़ातिब हैं जनाब गौतम राजऋषि। वही गौतम, जिन्होंने अपने बिलकुल जुदा कहन के अंदाज़ से शायरी को नई ताज़गी दी है। वही गौतम, जो किसी भी नए-पुराने ख़याल को अपने तरीक़े से लाजवाब बना देते हैं। वही गौतम, जो बेहद आम-सी चीज़ों को शायरी में पिरोकर नायाब बना देते हैं।

इस बार कर्नल गौतम हमारे लिए पेश हुए हैं राजपाल प्रकाशन के ज़रिये, जो किताबों और लेखन की दुनिया में एक रुतबा रखता है। 'नीला-नीला' नाम के अपने इस संग्रह में ये इश्क़ के रंग में पगी अपनी 111 ग़ज़लें लेकर आये हैं, जो युवा ग़ज़लप्रेमियों के लिए किसी बेहतरीन तोहफ़े से कम नहीं है।
हालाँकि प्यार, मुहब्बत और ग़ज़ल बहुत पुरानी चीज़ें हैं तो यह सवाल उठता है कि इनमें क्या नया मिल सकता है! लेकिन यक़ीन मानिए गौतम की कहन में वह कमाल है कि वे जिस चीज़ पर हाथ रख दे, उसे जगमगा कर रख सकते हैं। मेरी यह बात उन पाठकों के लिए बिलकुल नयी बात न होगी, जो गौतम को पढ़ चुके हैं। कुछ अशआर बानगी के तौर पर आप भी देखिए-

ख़ामोश घर चुभा तो मैं ये सोचने लगा
कब उसने रख दी पैर से पायल निकाल कर

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तेज़ हवा के इक झोंके ने जब बादल का नाम लिखा
धरती के सीने पर बारिश ने पायल का नाम लिखा

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क़ायदे से तो मुकम्मल होनी थी दीवानगी
लम्स था ऐसा कि दीवाना अधूरा रह गया

गौतम अपनी इन 111 ग़ज़लों के ज़रिये मुहब्बत के अनेक अलग-अलग शेड्स खींचते हैं। रोज़मर्रा की चुटीली बातों, झगड़ों, शिकवे-शिकायतों, मनुहारों, जुदाई के लम्हों, तड़प, किसी ख़ास के लिए नर्म-मुलायम एह्सासों जैसे कई-कई कथ्यों को वे इतनी ख़ूबसूरती से शेरों में ढालते हैं कि पढ़कर मन झूम-झूम उठता है।

भरी-भरी निगाह से ये देखना तेरा हमें
नसों में जैसे धीमे-धीमे बज रहा गिटार है

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लड़की ने लड़के के हाथों को हौले-से भींच लिया
जैसे ही हीरो ने हिरोइन को चूमा पिक्चर में

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रंग खिले हैं कितने सारे प्रेम कहानी में देखो
लाल-गुलाबी सी लड़की है लड़का नीला-नीला सा

गौतम जहाँ सामान्य शब्दों और विषयों में अलहदा शेर कहते हैं, वहीं बिलकुल ताज़े-अनछुए शब्दों/एह्सासों को इस्तेमाल करते हुए ताज़ादम शेर निकालते हैं। इनके यहाँ चाय, सिगरेट, चादर, कमरा, खिड़की, परदे, रसोई, बालकनी जैसे हमारे आसपास के सिर्फ शब्द नहीं, इन शब्दों/ जगहों/ चीज़ों से जुड़े हमारे ख़ास एह्सास मिलते हैं। वहीं मोबाइल, मैसेज, कॉल, स्पीकर, रिंग मास्टर, पोर्टिको कार, मैसेंजर, कल्चर, बैनर जैसे बिलकुल आज के शब्द इनकी ग़ज़लों का ज़ायका बढ़ाते हैं।

आँखें तो आँखें हैं जो दिखता है देखेगी लेकिन
जान मेरी सुन! तुझ पर ही बस सारा फ़ोकस रहता है

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हुआ अरसा नहीं बुझती बुझाने से भी यह कमबख्त
तुम्हारी याद की सिगरेट जो सुलगी हुई सी है

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रात गये पढ़ता रहता हूँ मैसेंजर के सन्नाटे
तेरी ख़ामोशी सुनता हूँ मोबाइल के स्पीकर में

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लहराता है हरा दुप्पटा उस छज्जे पर अक्सर जब
इस खिड़की में आह भरे है पर्दा नीला-नीला सा

गौतम आज के ग़ज़ल-परिदृश्य के उन चुनिन्दा नामों में हैं, जो तीन सौ साला ग़ज़ल को बिलकुल नई-नवेली बनाकर पेश कर रहे हैं। वे इन दिनों के ग़ज़लकारों में अपनी एकदम स्पष्ट छवि रखते हैं। इससे पहले इनका एक ग़ज़ल संग्रह आया है और भरपूर लोकप्रिय रहा है। ग़ज़ल के अलावा ये गद्य लेखन में भी हाथ आज़माते हैं और देशभर की नामचीन पत्रिकाओं में ससम्मान प्रकाशित भी होते हैं। इनके लेखन के सिलसिले को और आगे बढ़ाता यह 'नीला नीला' संग्रह इनके चाहनेवालों के दिलों में इनकी जगह को और मज़बूत करेगा, यह मेरा यक़ीन है।

इस बेहतरीन और ताज़ादम ग़ज़ल संग्रह के लिए प्रिय ग़ज़लकार गौतम राजऋषि को दिली मुबारकबाद और आकाश भर शुभेच्छाएँ।




समीक्ष्य पुस्तक- नीला नीला
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- गौतम राजऋषि
प्रकाशक- राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली
संस्करण- प्रथम 2020
मूल्य- 175 रुपये

अमेज़न लिंक-
https://www.amazon.in/Neela-Gautam-Rajrishi/dp/9389373190

Friday, February 14, 2020

बेहतरीन अंदाज़ की परंपरागत शायरी: रग-रग का लहू


'रग-रग का लहू' सरफ़राज़ अहमद 'आसी' का हालिया प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह है। शेरी अकादमी, भोपाल से प्रकाशित इस संग्रह में इनकी कुल 104 ग़ज़लें संग्रहीत हैं। उर्दू की रवायती शायरी को पसन्द करने वाले पाठकों को इस संग्रह की ग़ज़लें बहुत प्रभावित करेंगी।

'आसी' साहब से मेरा परिचय इनकी एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल के ज़रिये हुआ। परिचय तो शायद पहले का था लेकिन वह ग़ज़ल पढ़ने के बाद 'आसी' साहब का नाम मेरे ज़ेहन में अटक-सा गया। यह ग़ज़ल मेरे संपादन में आयी 'समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें' किताब में भी शामिल हुई। यह ग़ज़ल मेरे लिए आज भी किसी संग्रह से बढ़कर है। यह पूरी ग़ज़ल ही लाजवाब है। इसकी कहन, क़ाफ़ियों और रदीफ़ का निबाह बेह्तरीन है। जब इस ग़ज़ल की बात निकली है तो आप भी इसके कुछ अशआर पढ़िए-

उसकी फ़ितरत है ज़माने से लिपट कर रोना
मुझको आता नहीं तहज़ीब से हट कर रोना

काश मिल जाए वो रोने का ज़माना मुझको
माँ से फिर रूठ के बादल-सा वो फट कर रोना

उसके रोने का था अन्दाज़ निराला 'आसी'
कभी सीने से, कभी पीठ से सट कर रोना

हालाँकि मेरा मन तो आपको यह पूरी ग़ज़ल पढ़वाने का है, लेकिन यहाँ यह सम्भव नहीं। यह ग़ज़ल इस संग्रह में भी शामिल है।

ग़ाज़ीपुर ज़िले के यूसुफ़पुर निवासी सरफ़राज़ अहमद 'आसी' परंपरागत शायरी करते हुए बेहतरीन अल्फ़ाज़ में अपनी बात रखते हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों से गुज़रने के बाद इनकी शायरी के और भी कई रंग मुझ पर खुले। इनके पास आम इंसान की ज़िन्दगी से जुड़े तमाम तरह के अनुभव हैं और ये अनुभव ही इनके अशआर को गहराई देते हैं। कहीं-कहीं इनकी कहन अलग ही रंग में मिलती है और तब यह जान पड़ता है कि यह कहन इनको एक अलग तरह का शायर बना सकती है। हालाँकि विषयों की विविधता होते हुए भी इनका बंधे-बंधाये ढर्रे में शायरी करना अखरता है। लेकिन जहाँ भी आसी साहब लीक से ज़रा-सा हटकर बात कहते हैं, बेह्तरीन होते दिखते हैं।

मुझको मालूम है इक रोज़ ज़बां खोलेगी
माँग ले ज़िन्दगी मुझसे तू अभी जो लेगी
_________

मेरे मौला मेरी आँखों की तमन्ना है यही
मैं जिसे देख रहा हूँ उसे दुनिया देखे
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मेरी बस्ती में कई ऐसे ज़मींदार भी हैं
एक कमरे से निकालें तो कई घर निकले
_________

तोते की काविशों की वो खाता है रोटियाँ
देखेगा हाथ मेरा मुकद्दर बताएगा

ये कुछ ऐसे अशआर हैं, जो आपको मेरी उपरोक्त बात का समर्थन करते दिखेंगे।

इनके मरहूम दादा हुज़ूर भी शायर हुए हैं और वालिद साहब भी अदब से जुड़े रहे, इसलिए यह कह सकते हैं कि शायरी इनकी रगों में खून के साथ बहती है। साथ ही इनके क़स्बे में और आसपास बेह्तरीन शायरों की फ़ौज मौजूद है, जिनकी संगत इन्हें और इनके कलाम को बेह्तर से बेह्तरीन बनाती है। यह तराश इनकी ग़ज़लों में ख़ूब नज़र भी आती है और यही वजह है कि इनका शेर कहने का सधा हुआ ढंग दिल छूता है। कुछ अशआर देखिए-

वो हाथों में लिए काग़ज़ की गुड़िया बेचने वाले
गली में अब नहीं आते खिलौना बेचने वाले
यह शेर स्मृतियों की गूँज लिए हुए है और साथ ही बदलते ज़माने में चीज़ों के बदल जाने की एक टीस भी रखता है अपने भीतर।
_________

उम्र गुज़री तो यह अह्सास हुआ
मैं न बदला, मेरी सूरत बदली
बदलाव का अलग ढंग से प्रस्तुतिकरण देखिए।
_________

ग़ैरत पसन्द आदमी का है यही उसूल
दुनिया से अपने आप को कमतर बताएगा

इनकी शायरी में वर्तमान समय का अक्स भी दिखाई पड़ता है। देश और समाज की चिंताएँ, पीड़ाएँ, उलझनें आदि इनके लेखन में स्पष्ट दिखाई देती हैं। भ्रष्टाचार, दोगलापन, पत्रकारिता का पतन, धार्मिक कट्टरता जैसी चिंताएँ इनके लेखन में दिखलाई पड़ती हैं। यह एक साहित्यकार का फ़र्ज़ होता है कि वह अपने आसपास घटने वाली घटनाओं का मूल्याँकन करे और उनकी अस्ल वजहों और प्रभावों को आम लोगों तक पहुँचाये।

इज़्ज़त के साथ उसको बरी कर दिया गया
होता रहा अवाम में जिसकी सज़ा का ज़िक्र
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आज ख़ुशबू की हिमायत में खड़ा है वो भी
जिसको पैरों से कभी फूल मसलते देखा
_________

मेरी निगाह में कारे-सवाब है 'आसी'
किसी ग़रीब के बच्चे को रोटियाँ देना

देश के नफ़रत भरे मौजूदा हालात की झलक इनकी शायरी में कुछ यूँ मिलती है-

रंज था लेकिन गिला ऐसा न था
नफ़रतों का सिलसिला ऐसा न था
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हम में तुम में दूरियाँ तो थीं मगर
आज है जो फ़ासिला ऐसा न था
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इक तरफ तो सच को भी सच बोलना दुश्वार है
इक तरफ कुछ भी कहो आज़ादी-ए-इज़हार है

इन ख़राब हालात से परेशान एक शायर मिज़ाज इंसान इसका हल केवल मुहब्बत में तलाश करता है। आसी साहब भी आपसी सद्भाव और भाईचारे की हिमायत करते दिखते हैं और एक ऐसा रस्ता तलाश करने को कहते हैं, जो दरमियान का हो-

खेलने दो अपने बच्चों को मेरे बच्चों के साथ
इस बहाने दोस्ती का रास्ता बाक़ी रहे
_________

वो रंग जिसपे किसी को भी इख्तिलाफ़ न हो
चलो तलाश करें कोई दरमियान का रंग
_________

फिर धमाकों में कोई और न मरने पाये
अमन की राह में अब कोई कबूतर निकले

समृद्ध शायर सरफ़राज़ अहमद 'आसी' का यह संग्रह न केवल पठनीय है अपितु संग्रहणीय भी है। ख़ासकर उन नए ग़ज़लकार साथियों के लिए जो शायरी का सलीक़ा सीखना चाहते हैं। आसी साहब को उनके ही इस शेर के साथ इस संग्रह के लिए मुबारकबाद और आने वाले तमाम संग्रहों के लिए शुभेच्छाएँ कि आपकी ग़ज़ल यूँ ही बोलती रहे-

मैंने रग-रग का लहू देके सँवारा है इसे
मैं अगर चुप भी रहूँगा तो ग़ज़ल बोलेगी





समीक्ष्य पुस्तक- रग-रग का लहू
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- सरफ़राज़ अहमद 'आसी'
प्रकाशक- शेरी अकादमी, भोपाल
संस्करण- अक्टूबर, 2019
पृष्ठ- 136, मूल्य- 300 रूपये

Tuesday, February 11, 2020

हिन्दी ग़ज़ल का एक महत्वपूर्ण संग्रह: चुप्पियों के बीच



'चुप्पियों के बीच' किताबगंज प्रकाशन से हाल ही में आया हिन्दी ग़ज़ल का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। यह संग्रह डॉ. भावना द्वारा रचित है। डॉ. भावना हिन्दी ग़ज़लकारों और पाठकों के लिए एक सुपरिचित नाम हैं। आज की ग़ज़ल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर उस्ताद ग़ज़लकार डॉ. दरवेश भारती कहते हैं कि-
"डॉ. भावना आज की महिला ग़ज़ल-लेखन में सबसे अधिक सफल ग़ज़लकारा हैं।......इनकी ग़ज़लों में यथार्थवाद का वह रूप मिलता है, जो निश्चय ही शुभ और स्वस्थ है।..... इनकी ग़ज़लें सामाजिक, राजनैतिक और दैनिक जीवन के यथार्थ चित्रों से परिपूर्ण हैं। सुलगते यथार्थ को सूत्रबद्ध और व्यवस्थित करना और उनमें प्राण डालना इनकी ख़ास विशेषता है।"


जब दरवेश भारती जैसा जीनियस किसी ग़ज़लकार के लिए ऐसी घोषणा कर दे तो इसका महत्व हम समझ सकते हैं कि उस ग़ज़लकार में क्या क्षमता होगी। बिहार के मुज़फ्फरपुर निवासी डॉ. भावना का यह तीसरा ग़ज़ल संग्रह है। इससे पहले आया इनका ग़ज़ल संग्रह 'शब्दों की क़ीमत' भी ख़ासा चर्चित रहा है। जैसा कि दादा दरवेश भारती जी ने बताया कि डॉ. भावना ग़ज़ल लिखते समय अपने दौर को ज़ेहन में रख; समाज, राजनीति और हमारे दैनिक जीवन की घटनाओं पर बारीकी से नज़र रखती हैं। इनके लिए अपने निजी अनुभव जितने ज़रूरी हैं, उतने ही ज़रूरी हैं- समाज और आम इंसान की जद्दोजहद। इनकी ग़ज़लों में कपोल-कल्पनाएँ और उक्ति वैचित्र्य बहुत कम मिलता है। ये सीधी-सादी भाषा में अपनी बात रखना पसन्द करती हैं।

डॉ. भावना के ग़ज़ल लेखन में ज़मीनी सच मुखर होकर आता है। लेकिन इस अंदाज़ में कि वह कविताई के मर्म को ज़िन्दा रखे रहे। कुछ शेर देखें-

एक इमारत जुग्गी पर इठलाएगी
कोई बंदा घर से बेखर हो तो हो
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कहोगे तुम नहीं जितना वो अब उतना समझता है
समय की नब्ज़ को अब पेट का बच्चा समझता है
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हमेशा घर की बहुओं में हज़ारों दोष होते हैं
हमेशा अपनी बेटी ही हमें शालीन लगती है
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यहाँ खरगोश को भी मात दे जाता है इक कछुआ
विजय की हर कसौटी तो लगन पर आके रुकती है

अपने समय से मुख़ातिब इन कुछेक शेरों से ही यह आभास और विश्वास हो जाता है कि वर्तमान इनकी ग़ज़लों में किस तरह मज़बूती से आता है। एक प्रतिबद्ध रचनाकार की यह ख़ूबी होती है कि वह अपने दौर में जीता है, अपने दौर को रचता है।

भाषा की बात की जाय तो वे आम व्यक्ति की सामान्य बातचीत की भाषा में अपना रचनाकर्म करती हैं। इनके यहाँ भाषा को लेकर न किसी प्रकार की दुरुहता मिलती है न पूर्वाग्रह। ये हिन्दी परिवेश में रहते हुए आम हिन्दुस्तानी पाठक के लिए सृजन करती हैं। इनके लेखन की सहजता देखिए-

भला बनने की ऐसी क्या ज़रूरत
हो जैसे भी, यहाँ वैसे रहो तुम
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बिना बोले ही कह जाते बहुत हैं
ये आँसू लफ़्ज़ों से अच्छे बहुत हैं
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पल में सो जाता है आँचल में बिलखता बच्चा
माँ को क्या ख़ूब सुलाने का हुनर आता है

समाज के सरोकारों पर भी इनकी पैनी नज़र रहती है। इनके यहाँ का यथार्थ ग़ज़ल के बाक़ी तमाम पहलुओं पर भारी पड़ता है। और इसी एक वजह से ये अपने समय की महिला ग़ज़लकारों से बहुत आगे खड़ी मिलती हैं। यथार्थ की आँखों में आँखें गढ़ाने का साहस इन्हें विशिष्ट बनाता है। यही साहस पूरे हिन्दी परिवेश की ग़ज़लों की विशेषता है।

भूख का रूप आप क्या जानें
आपने पेट भर के खाया है
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बड़ी बिल्डिंग, बड़ी सड़कों के ही क़िस्से सुनाती है
शहर की तितलियाँ जब गाँव में भूले से आती हैं
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चार चूल्हे थे मगर अम्मी रही भूखी
घर के भीतर घर को कैसे ढो रहे थे हम
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जिसे पढ़ने को जाना है उसे नौकर बनाती है
हर इक छोटू के बचपन को ग़रीबी लील जाती है

एक महिला हमारे समाज में कितनी ही उथल-पुथल लेकर जीती है या यूँ कहिए कि अपने आपको बचाए रखती है। क़दम-क़दम पर वह न चाहते हुए भी कई-कई समझौते करती है, हालत से मुक़ाबला करती है। ऐसे में एक महिला के दृष्टिकोण से महिलाओं के जीवन और अनुभवों पर कहे गये ये शेर उनके महिला ग़ज़लकार होने की सार्थकता सिद्ध करते प्रतीत होते हैं-

कितना अजब कमाल है पुरखों की जीन का
नानी की शक्ल लेके मैं धरती पे आ गयी
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खिड़की, आँगन, गलियाँ रोयीं
पीहर से जब रिश्ता छूटा
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इस पड़ोसन को क्या कहूँ आख़िर
कब की खुन्नस निकाल बैठी है
________________

कभी हँसती, कभी रोती, कभी चुप्पी लगाती है
ये औरत रोज़ छल-बल की लड़ाई हार जाती है

पेशे से शिक्षिका, शौक़ से लेखिका एवं संपादक डॉ. भावना का व्यक्तित्व और कृतित्व अनुकरणीय है। उन्हें पढ़कर यह जाना जा सकता है कि ग़ज़ल जैसी पारम्परिक और समृद्ध विधा में किस तरह अपने समय की आधुनिकता का समावेश किया जाता है। इस ग़ज़ल संग्रह के लिए उन्हें और किताबगंज को आत्मीय शुभेच्छाओं के साथ बेह्तर साहित्यिक भविष्य के लिए मंगलकामनाएँ।




समीक्ष्य पुस्तक- चुप्पियों के बीच
रचनाकार- डॉ. भावना
विधा- ग़ज़ल
प्रकाशक- किताबगंज प्रकाशन, गंगापुरसिटी (राजस्थान)
संस्करण- प्रथम (मई 2019)
पृष्ठ- 96
मूल्य- 195 रुपये

Tuesday, August 27, 2019

परम्परा का निर्वाह करते हुए आधुनिकता की तलाश करता संग्रह: बला है इश्क़



कुछ रोज़ पहले कानपुर (उ.प्र.) निवासी ग़ज़लकारा अलका मिश्रा जी का नवप्रकाशित ग़ज़ल संग्रह 'बला है इश्क़' मिला। यह इनका पहला ग़ज़ल संग्रह है। संग्रह की 80 ग़ज़लों से गुज़रने पर हम पाते हैं कि अलका जी की शायरी परम्परा का निर्वाह करते हुए आधुनिकता की तलाश करती है। एक तरफ मज़बूत शिल्प के साथ रवायती शायरी पढ़ने को मिलती है तो दूजी तरफ कहन और कथ्य में ताज़गी भी दिखायी पड़ती है।

अलका जी से मेरा परिचय '101 महिला ग़ज़लकार' के संपादन के दौरान हुआ था और उस समय पढ़ी इनकी 4-5 ग़ज़लों ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया। इनके ग़ज़ल लेखन में एक ठहराव है, एक संजीदगी है, जो इन्हें विशिष्ट बनाती है। अगर 20 महिला ग़ज़लकारों की एक सूचि बनायी जाये जो शिल्प, कहन, भाव आदि पैमानों पर मज़बूत ग़ज़ल लेखन कर रही हैं तो मैं अलका जी का नाम उसमें रखना चाहूँगा।

आज की ग़ज़ल चाहती है कि ग़ज़लकार पुराने ढर्रों को तोड़ते हुए उसे कुछ अलग तरह से सँवारे लेकिन उसमें उसके नाज़ुक स्वभाव का बहुत ज़िम्मेदारी के साथ ख़याल रखा जाय। उसके शेरों में बेशक वर्तमान हो, जीवन की बुनियादी बातें हों मगर हो-हल्ला न हो। बहुत नफ़ासत से इशारों-इशारों में चोट की जाए। हो-हल्ला करना बहुत आसान है, इशारों में मारक क्षमता के साथ चोट करना बहुत मुश्किल। इसीलिए ग़ज़ल कहना इतना आसान भी नहीं, जितना हम समझते हैं।

अलका जी ग़ज़ल में प्यार मुहब्बत की बातें भी करती हैं, जीवन की जद्दोजहद को भी उकेरती हैं तो विसंगतियों पर तंज़ भी कसती हैं। इनकी शायरी में जीवन के कई रंग देखे जा सकते हैं। इनके मख़मली एहसासों के कुछ शेर देखिए-

उसकी आँखों के रास्ते होकर
दिल का ज़ीना उतर रही हूँ मैं
__________________

ये तेरी याद ना! सच कह रही हूँ
मेरी नींदों की दुश्मन है अभी तक
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जान की बाज़ी लगा बैठा है फिर
फिर कोई आशिक़ जुआरी हो गया
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जो उसने जान भी माँगी तो हँस के दे देंगे
ज़रा-सी बात का शिकवा नहीं करेंगे हम

ज़िन्दगी के सबके अपने-अपने तज्रिबे होते हैं। इसे जीने और इससे लड़ने के अपने-अपने तरीक़े होते हैं। अलका जी के पास भी अपने तज्रिबे और अपने तरीक़े हैं। आइए देखते हैं कि जीवन को लेकर ये क्या कहती हैं-

ज़मीं पे आने से साँसों के रूठ जाने तक
रहे सफ़र में मुसलसल क़ज़ा के शाने तक
__________________

सभी हैरान हैं इस ज़िन्दगी के स्वाद को लेकर
कभी खट्टी, कभी मीठी, कभी नमकीन लगती है
__________________

जिसे बैसाखियाँ लेकर गयी हों उसकी मंज़िल तक
कभी उस शख्स़ के हिस्से में ख़ुद्दारी नहीं आती
__________________

घर की क़ीमत कोई उससे ही पूछे
जो इक छत का ख़्वाब सजाता फिरता है

एक ज़िम्मेदार रचनाकार अपने समाज और उसकी व्यवस्था को लेकर हमेशा सजग रहता है। समाज में रहते हुए कई ऐसी चिंताएँ होती हैं, जो उसे हर सामान्य व्यक्ति की तरह बल्कि उससे कुछ ज़्यादा ही प्रभावित करती हैं। ऐसे में उसके लेखन में भी यह फ़िक्र साफ़ झलकती है। यहाँ भी इसकी झलक है-

अपने, अपनों से कट रहे हैं क्यों
दायरों में सिमट रहे हैं क्यों
__________________

जान होती है हथेली पे जो घर से निकलें
दौर-ए-हाज़िर में फ़सादात से डर लगता है
(फ़सादात= फ़सादों)
__________________

अब मेरा मुल्क किसी तौर न तोड़ा जाए
आओ मिल-जुल के इसे प्यार से जोड़ा जाए

कुछ ऐसे शेर भी इनके यहाँ मिलते हैं, जो एक महिला ग़ज़लकार होने के नाते कहे जाने ज़रूरी हैं। यानी कुछ ऐसे अनुभव जो दुनिया से केवल एक महिला को ही मिलते हैं। इन शेरों में एक शेर जो बहुत आम-सा ख़याल लिए हुए है, आज तक लाखों महिलाएँ इस भाव से दो-चार हुई हैं लेकिन शायरी में ढलकर शायद ही हमारे सामने कभी आया हो। इस शेर को अगर मैं किताब का हासिल कह दूँ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। जितना ज़रूरी यह कथ्य है उतनी ही संजीदगी से इसे कहा भी गया है, देखिए-

जब तक न मेरी कोख से कोंपल कोई फूटी
लोगों की नज़र में किसी बंजर-सी रही हूँ

इसी स्वभाव के कुछ और शेर-

वो समुन्दर से कुछ नहीं कहते
हैं नदी के उफ़ान पर बातें
__________________

तोड़ देती हैं बेड़ियाँ अक्सर
क़ैद में रह के बेटियाँ अक्सर
__________________

हालात ने मज़बूत मुझे इतना बनाया
मिट्टी से बने जिस्म में पत्थर-सी रही हूँ

केवल 80 ग़ज़लों में ही अपनी शायरी से अलका जी पाठक के मन में छाप छोड़ने में सफ़ल रहती हैं। इनके लेखन में हर मिज़ाज के शेर मिलना सुखद है। पुस्तक के अलावा इनकी रचनाएँ रेख्ता और कविताकोश पर भी पढ़ी जा सकती हैं। सोशल मिडिया और पत्रिकाओं के साथ-साथ अलका जी मंचों पर भी बराबर सक्रिय हैं। इनकी यह सक्रियता बढ़ती रहे और ग़ज़ल लेखन समृद्ध होता रहे, शुभकामनाएँ।




समीक्ष्य पुस्तक- बला है इश्क़
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- अलका मिश्रा
प्रकाशक- गुंजन प्रकाशन, मुरादाबाद (उ.प्र.)
संस्करण- प्रथम, 2019
मूल्य- 200 रूपये (हार्डबाउंड)

Tuesday, December 26, 2017

भोगा हुआ यथार्थ है: चेहरा रिश्तों का




ये मेरी रूह भारी है या हल्की
कहीं इसको डुबोकर देखते हैं

जाने किसकी उम्र चुराकर लाया था
शाम को सूरज होकर बूढा डूब गया

थके बादल लिबास अपना जहाँ जाकर बदलते हों
ज़मीं का यार वो हिस्सा कभी सहरा नहीं रहता

नयी सदी के दूसरे दशक में शायरी के क्षेत्र में बदलाव और ताज़गी अब महसूस की जाने लगी है। वक़्त हमेशा करवट लेता रहता है, इसलिए चीज़ें भी हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। बदलाव एक बहुत ज़रूरी प्रक्रिया है। बदलावों के साथ जिसने अपने आप को 'मॉडरेट' किया, वही टिका रहा और उसी की पूछ बनी रही। आज जब हर तरफ हम देखते हैं कि ग़ज़ल की शान में हर कोई क़सीदे पढ़े जा रहा है, इस विधा के भविष्य को बहुत उज्ज्वल बता रहा है तो उसके पीछे इन बदलावों की अहम भूमिका रही है। ग़ज़ल ने अपने आप को हमेशा लचकदार बनाये रखा है और वक़्त की ज़रूरत के हिसाब से इसने अपने आप को बार-बार मॉडरेट किया है।

आज के दौर की माँग है एक अलग तरह से बात कहना, जो पढ़ते/सुनते ही दिल में उतर जाये। एह्सास हमेशा वही रहे हैं लेकिन प्रतीक व बिम्ब हर दौर में बदलते रहे हैं। तो उन्हीं एहसासों के साथ अगर शायर अलग तरह से अपनी बात रखने में सफल हो जाये तो इस पीढ़ी के लोग उसे यक़ीनन कुबूल करेंगे। अगर हम सदियों पुराने एह्सास उन्हीं घिसे-पिटे तरीकों से कहते रहेंगे तो पाठक क्यों पढेंगे उन रचनाओं को और अगर पढेंगे तो क्यों याद रखेंगे!

इस समय नए शायरों की एक खेप अपनी बात को इस अंदाज़ में शायरी में ढाल रही है कि सुनकर या पढ़कर कोई भी उफ़्फ़ करके रह जाए। यही वजह है उनके इतने मक़बूल होते जाने की। जॉन एलिया को उनकी कहन की वजह से नयी पीढ़ी सिर-आँखों पर बिठा रही है। उनके पास हैरत में डालने वाली कहन है। इस समय की फिल्मों के गाने भी इसी वजह से इतने लोकप्रिय हो रहे हैं क्योंकि उनमें ताज़गी भरी कहन है।

ऊपर कोट किये शेर भी कहन में कुछ अलग ही ताज़गी लिए हैं। इनमें प्रयुक्त भाव वही हैं, जो हम हमेशा से पढ़ते आये हैं लेकिन अलग ही कहन लिए हैं यह शेर और इसीलिए एकदम से ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।
'चेहरा रिश्तों का' ग़ज़ल-संग्रह से लिए ये शेर यूसुफ़ रईस के हैं, जो शायरी के पाठकों के लिए अनजान नाम नहीं है। यूसुफ़ ग़ज़ल से मुहब्बत रखने वालों के बीच अपनी अलहदा कहन और वज़नदार शायरी की वजह से जाने जाते हैं।

राजस्थान के पिड़ावा (ज़िला- झालावाड़) से संबंध रखने वाले यूसुफ रईस सालों तक पत्रकारिता से जुड़े रहे। गद्य व पद्य में अपनी अभिव्यक्ति करते रहे और ख़ूब छपते भी रहे लेकिन फेसबुक पर आने के बाद कुछ साल पहले ग़ज़ल से रूबरू हुए और उसका दामन थाम बैठे। दो साल पहले अपने पहले ग़ज़ल-संग्रह 'इक तनहा सफ़र' के ज़रिए पाठकों के बीच आये और अब 'चेहरा रिश्तों का' से दूसरे संग्रह तक पहुँच गए हैं।
बोधि प्रकाशन, जयपुर से आये इस संग्रह में इनकी कुल 108 ग़ज़लें हैं, जो यह बता रही है कि यूसुफ़ अब एक परिपक्व शायर हो चुके हैं। हालाँकि अभी डगर बहुत लम्बी है लेकिन वे अब इस सफ़र के क़ाबिल मुसाफ़िर हैं।

यूसुफ़ परम्पराओं से जुड़े रहकर आधुनिकता का समर्थन करते हैं। उनके कलाम में शायरी का रिवायती रंग भी मिलता है तो जदीदियत भी साफ़ झलकती है। इनकी शायरी कोरी लफ्फाज़ी न होकर भोगा हुआ यथार्थ ज़्यादा है। वे आसमान में न उड़कर ज़मीन पर बने रहना पसन्द करते हैं। अम्न पसन्द शख्स हैं और इंसानियत का समर्थन करते हैं। वे अपने शेरों के ज़रिए अच्छे संदेश भी देते दिखते हैं, कुछ शेर देखिए-

हमारे बीच में झगड़े बहुत हैं
सुलह के भी मगर रस्ते बहुत हैं

जो बताये नफ़रतों के रास्ते
चाहे कोई हो वो मज़हब, झूट है

यूसुफ़ अपने मज़हबी और सामाजिक दायरों में रहना पसन्द करते हैं लेकिन किसी भी बात को आँख बंद कर सच मानने वालों में कतई नहीं। वे ख़ुदा की ज़ात पर पूरा भरोसा रखते हैं लेकिन धार्मिक आडम्बर और धर्म के ठेकेदार इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते।

इनके शेरों में ज़िन्दगी की हक़ीक़त बयान होती है। इसी अनुभव के ज़रिए वे सामान्य जन को सचेत करते हुए दिखते हैं। दुनिया में इंसान की नहीं बल्कि उसके द्वारा पूरे होते स्वार्थों की एहमियत है, इस बात को समझाता यह शेर देखिए-

ये ढलती हुई शाम का ही असर है
जो साया मेरा मेरे क़द से बड़ा है

ज़िन्दगी में क़दम-क़दम पर होने वाली आज़माइश से होशियार करता यह मतला और एक शेर कितना सच्चा है, देखिए-

ये कश्ती आज़माएगी, समन्दर आज़माएंगे
चलेंगे जब सफ़र पर तो सभी डर आज़माएंगे

क्यों शीशे-सी सिफ़त लेकर चले आये हो बस्ती में
यहाँ हर मोड़ पर राहों के पत्थर आज़माएंगे

समाज व परिवार में रहते हुए तमाम दायित्व निभाने और संबंधों को ज़िन्दा रखने के लिए हमें अनेक बार अपने स्वाभिमान को एक तरफ रखना पड़ा है, अनेक बार समझौते करने पड़े हैं। इस भाव को कितनी ख़ूबसूरती से शेर की शक्ल दी है, देखिए-

कुछ रिश्तों की जान बचाने की ख़ातिर
अपने सर को रोज़ कुचलना पड़ता है

जीवन के यथार्थ से जुड़ी इनकी शायरी कई बार दार्शनिकता के नज़दीक पहुँच जाती है-

जिनपे कुछ मासूम परिन्दे रहते हैं
उन पेड़ों के फल भी मीठे होते हैं

बहुत ही सहजता से यहाँ इन्होंने परोपकार का महत्त्व समझा दिया। पेड़ों से ज़्यादा परोपकारी कौन होगा भला इस धरती पर! यदि इंसान उनसे सीखना चाहे तो कितनी ही बातें सीख सकता है और अपना जीवन सँवार सकता है।

इनके शेरों में कहीं-कहीं ख़राब होते पर्यावरण की फ़िक्र भी झलकती है-

जबसे जंगल बस्ती में तब्दील हुए
टूट रहा है तबसे दम ख़म बारिश का

जंगलों को काटकर जहाँ हम अंधाधुंध अपनी बस्तियाँ बसाने या कारख़ाने स्थापित करने पर तुले पड़े हैं, वहाँ बारिश के दम ख़म की फ़िक्र कौन करे! लेकिन शायर यहाँ लोगों को आगाह कर रहा है कि अगर इन चीज़ों पर गौर नहीं किया गया, तो नतीजे भी भुगतने होंगे।
ज़मीन पर सरहदों की लकीरें खींचने के बाद अब अंतरिक्ष, चाँद और मंगल को कब्जाने की जो होड़ लगी है, उस तस्वीर को यूँ कलम से क़ैद करते हैं यूसुफ़-

पहले सौदा किया ज़मीनों का
फिर दिया आसमान ठेके पर

हमारे सामाजिक जीवन से ख़त्म होती इंसानियत के प्रति भी बहुत फ़िक्रमंद है यह रचनाकार। वे समाज और आदमी से बहुत गहराई से जुड़े व्यक्ति हैं। अपने क्षेत्र में वे लोक-कल्याण के कार्यों में लगातार सक्रीय रहते हैं। कुछ इसी वजह से भी समाज में कम होते अपनत्व और आदमीयत के लिए दुखी होते हैं। अपने एक शेर में वे कहते हैं कि ख़ुदा ने इंसान को अशरफुल-क़ायनात (सृष्टि में श्रेष्ठ) बनाया था लेकिन उस वक़्त के इंसान जैसा इस वक़्त का इंसान बिल्कुल नहीं है। सच कहा बिल्कुल, आज के इंसान की हरकतें देखकर इनका शेर बिल्कुल सटीक लगता है। शेर देखिए-

ख़ुदा ने जिसको ख़ुद अशरफ़ कहा था
उस आदम जैसा ये आदम नहीं है

अब तो हर तरफ इंसान की शक्ल में शैतान नज़र आते हैं जो मौक़ा मिलने पर वह सब कर बैठे, जहाँ तक सोच भी नहीं जाती। सच है हमारे बीच कई ऐसे दरिन्दे हैं, जो आदमी होने का भ्रम पैदा कर रहे हैं, अस्ल में उनमें आदमीयत है ही नहीं।

यहाँ वहशी दरिन्दे बस गए हैं
नज़र आते हैं जो सब आदमी-से

ऐसा ही एक और शेर देखिए-

ये बस्ती है या इंसानी जंगल है
इसमें तो आसान नहीं घर हो जाना

समाज और समय की फ़िक्र रचनाओं में होना बेहद ज़रूरी है और अगर फ़िक्र के साथ समस्याओं के हल भी हों तो सोने पे सुहागा। अपनी या औरों की ज़िन्दगी की मुसीबतों से सबक लेते हुए लोगों को सचेत करना एक अच्छे रचनाकार के लक्षण हैं। यूसुफ़ भी हमें इन हालात में फ़िक्रमंद होते हुए सचेत भी करते हैं।

यूसुफ़ रईस की शायरी दिल से निकलकर दिल तक पहुँचने वाली शायरी है। इनके शेर बिना किसी लाग-लपेट के सधे हुए लहजे में अपनी बात कहते हैं। हिन्दी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा में अपनी बात रखने वाले यूसुफ़ हर दिल अज़ीज़ शायर हैं। इन्हें किताब की क़ामयाबी के लिए मुबारकबाद और भविष्य में और अच्छी-अच्छी ग़ज़लों के लिए दुआएँ।

चलते-चलते कुछ शेर और-

रोशनी को क़ैद करके रख सकोगे कब तलक
इन चिराग़ों का उजाला आसमां तक जाएगा

शह्र में ये मुद्दतों चर्चा रहा
एक साया खो गया दीवार में

भूल बैठा हूँ ज़ायका सबका
रंज कैसा है और ख़ुशी कैसी

बस्तियों में शोर आख़िर थम गया
बच्चों की आँखों में दहशत रह गयी

सुनते-सुनते मेरी आँखें भीग गयीं
और वो अपनी कहते-कहते लौट गया

महक रही हैं अब तक साँसें
उसने बस इक बार छुआ था




समीक्ष्य पुस्तक- चेहरा रिश्तों का
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- यूसुफ़ रईस
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर
संस्करण- प्रथम, 2017 (पेपरबैक)
मूल्य- 120 रूपये

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Tuesday, December 12, 2017

हर इक ख़ूबी-ओ-ख़ामी पर नज़र जाए तो अच्छा हो: दहलीज़ का दिया




'दहलीज़ का दिया' भाई वाहिद काशीवासी का पहला ग़ज़ल संग्रह है। बनारस के रहने वाले वाहिद काशीवासी का मूल नाम संदीप द्विवेदी है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू ज़बानों पर बराबर पकड़ रखने वाले संदीप पेशे से स्वतन्त्र अनुवादक हैं।
'दहलीज़ का दिया' जैसा कि मैंने बताया, इनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जिसमें इनकी कुल 51 ग़ज़लें संग्रहित हैं। संग्रह की दो ख़ूबियां हैं जो इसे अन्य पुस्तकों से थोड़ा अलग करती हैं-
1. प्रस्तुत संग्रह देवनागरी और नस्तालीक़ दोनों लिपियों में प्रकाशित हुआ है। मतलब एक ही साथ सभी ग़ज़लें दोनों ज़बानों में पढ़ी जा सकती हैं। पुस्तक के आगे का हिस्सा देवनागरी व पीछे का हिस्सा नस्तालीक़ लिपि में है।
2. इस संग्रह में प्रकाशित सभी ग़ज़लों की बह्रों के बारे में पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर विस्तार से जानकारी दी गयी है।

साथ ही मुझे इसकी ख़ूबी यह भी लगी कि पुस्तक में उर्दू ज़बान के शब्दों को बहुत ही सलीक़े से शुद्दता के साथ पेश किया गया है। हमारी मिली-जुली भाषा में प्रचलित हो चुके शब्दों जैसे- शुक्रिया, हिस्सा, ज़माना, तारीफ़ आदि को क्रमशः शुक्रिय: हिस्स: ज़मान: ता'रीफ़ लिखा गया है, जो इनका मूल स्वरूप है।
अपने माता-पिता की पावन स्मृतियों को समर्पित इस पुस्तक में शामिल वाहिद भाई की ग़ज़लों पर क्लासिक ग़ज़ल परम्परा का सीधा असर देखा जा सकता है। जदीद फ़िक्र के बावजूद भी अरबी-फ़ारसी के भारी शब्दों से इन्हें ज़्यादा लगाव है, यह पुस्तक की सभी ग़ज़लों में दिखाई देता है।
मैं इसे किसी तरह की ख़ामी न कहकर महज़ अपनी बात रखना चाहूँगा कि किसी भी साहित्यिक रचना की लोक में स्वीकृति तभी संभव है, जब उस रचना में लोक में प्रचलित भाषा के ज़रिए ही बात रखी गयी हो।

नई सदी के आरम्भ से ही शायरी में बुनियादी बदलाव नज़र आने लगे थे और अब डेढ़ दशक से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद देखा ये जा रहा है कि आज के शायर कहन के साथ-साथ ख़यालों से भी शायरी में ताज़गी भर रहे हैं। ऐसे में ग़ज़ल विधा के नए रचनाकारों को अपने आपको स्थापित करने में कुछ और मेहनत की ज़रूरत तो है ही, साथ ही इस क्षेत्र में इन बदलावों पर भी गौर करना होगा और अपने आपको अपडेट करना होगा।
हालाँकि शुरूआती दौर के लिहाज़ से संदीप भाई की कड़ी मेहनत का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है। ऊपर बताई तीन भाषाओं की अच्छी जानकारी के अलावा शब्दों को बरतने का तरीका, शेर कहने का सलीका और स्वाध्याय जैसे इनके गुण पुस्तक से बा-ख़ूबी ज़ाहिर होते हैं।

ग़ज़लों में कहीं-कहीं अच्छी फ़िक्र के शेर भी मिलते हैं और आसान शब्दों में कहे शेर भी। शिल्प पर भी इनकी अच्छी-ख़ासी पकड़ की झलक भी देती है यह पुस्तक। कहीं-कहीं बह्र के मैदान में हाथ साधते दिखते हैं तो कहीं एहसासों की ज़मीन पर अच्छी फ़स्ल भी उगाते हैं। कुल मिलाकर एक अच्छे शाइर की संभावनाएँ दर्शाता यह ग़ज़ल-संग्रह संदीप भाई से सही दिशा में मेहनत करने की उम्मीद करता है।

पूरी किताब में जहाँ-तहाँ आपका राबता रचनाकार के फ़क़ीराना मिज़ाज से भी होता रहेगा। चूँकि संदीप भाई को बचपन से घर में अदब के साथ-साथ संगीत का भी अच्छा माहौल मिला, उसका असर भी इनके लेखन में दिखता है।

फ़ुतूर इसको कहो चाहे सनक या फिर मेरी आदत
किसी को कुछ न समझूँ मैं, किसी को सब समझता हूँ
यह चीज़ एक कलन्दर में ही मिलती है, जो दुनियादारी और सांसारिक मोह-माया से परे हो।

ज़माने की आबो-हवा की फ़िक्र करते शेर भी कई जगह मिलते हैं-

बन रही हैं कुछ सड़कें, शह्र में महीनों से
गर्द से है घुटता दम, यह तरक्क़ी पाई है

न मिल पाया बंद: कोई काम का
जो लफ़्फ़ाज़ ढूँढे सरासर दिखे

अपने-अपने झूट पर सब इस क़दर थे मुतमइन
सामने आया जो सच तो हर कोई हैरान है

हज़ारों झूट हाथो-हाथ बिक जाएँ यहाँ लेकिन
किसी बाज़ार में सच की कोई क़ीमत नहीं मिलती

कुछ अशआर, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया-

ख़ाहिश कोई हो शर्तिय: होती है मुकम्मल
इंसान अगर गिर्द* से बेदार हुआ है
गिर्द- आसपास

बित्ते भर की विशाल बनती हैं
फुनगियाँ ही तो डाल बनती हैं

इस कड़ी धूप में वो झुलस जाएगा
नन्हे पौधे पे कुछ देर साया करो

रात इक पल तुम्हारी याद आई
उम्र गुज़री वो पल नहीं गुज़रा

पुस्तक में 'हैं बनारस वाले' रदीफ़ से एक रोचक ग़ज़ल मिलती है, जो बनारसवासियों की कई विशेषताओं का बखान करती है, तंज कसती है। यह एक मुरस्सा और मुसल्सल ग़ज़ल है। हास्य का पुट होने की वजह से कहीं-कहीं इसमें 'हज़ल' के दर्शन भी होते हैं।

सारी दुनिया को सिखाते हैं बनारस वाले
रूह को तन से मिलाते हैं बनारस वाले
गंग भी बहती है उल्टी ये जगह ऐसी है
हर नियम तोड़ के जाते हैं बनारस वाले
कोई चेला नहीं काशी में किसी का यारो
'का गुरु!' कह के बुलाते हैं बनारस वाले

एक शेर में संदीप भाई कहते हैं कि-

मैं ग़ज़ल कहता मुरस्सा मुझे हसरत थी बड़ी
पर अलग ही है मज़ा कहना फ़साहत* में यूँ

फ़साहत- सादे शब्दों में सुंदर ढंग से बात कहना
मैं यह कहूँगा कि सादे शब्दों में सुंदर ढंग से बात कहने का अलग ही मज़ा है संदीप भाई। हम आपसे अगले संग्रह में यही उम्मीद करेंगे।
आपको पहले संग्रह के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद। सुनहरे साहित्यिक भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित अपनी बात आप तक पहुँचा दी है। बाक़ी आप ख़ुद पुस्तक की भूमिका में लिख रहे हैं-
"चूँके ज़ाती तौर पर मेरा मानना है कि सीखना ता-उम्र लगा रहता है और हमें ये एहसास दिलाता है कि हम ज़िन्द: हैं।"
और वैसे भी आप चाहते हैं कि-

कहा जो उनके कानों तक ख़बर जाए तो अच्छा हो
हर इक ख़ूबी-ओ-ख़ामी पर नज़र जाए तो अच्छा हो

मेरी पूरी कोशिश रही है कि हर ख़ूबी-ओ-ख़ामी पर बात करूँ। और उम्मीद करता हूँ कि अपनी कोशिश पर खरा उतरा हूँ।






समीक्ष्य पुस्तक- दहलीज़ का दिया
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- वाहिद काशीवासी
प्रकाशक- संदीप द्विवेदी
       गंगाबाग़ कॉलोनी, लंका
       वाराणसी- 221005
संस्करण- प्रथम, 2017 (पेपरबैक)
मूल्य- 90 रूपये मात्र

Saturday, July 16, 2016

मोगरे की भीनी-भीनी खुशबू से महकती शायरी की एक किताब: डाली मोगरे की




'मोगरे की डाली' के आस-पास बैठकर कभी हम अगर ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं को शायरी के ज़रिये फूलों की खुशबू की तरह महसूस करें!
अरे नहीं! मैं कोई ख्व़ाब की बात नहीं कर रहा, न ही कोई ख्व़ाब सजा रहा हूँ। मैं ज़िक्र छेड़ रहा हूँ उम्दा शायर और बड़े भाई नीरज गोस्वामी के पहले ग़ज़ल संग्रह 'डाली मोगरे की' का।

शायरी मेरी तुम्हारे ज़िक्र से
मोगरे की यार डाली हो गयी

अभी कुछ दिनों पहले बड़े भाई नीरज जी ने अपनी यह बहुचर्चित पुस्तक सप्रेम भेज मुझे अपने आशीर्वाद से नवाज़ा है। मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ।
इस पुस्तक की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से सहज ही लग जायेगा कि इसका पहला संस्करण 2013 में आया, 2014 में दूसरा और फिर 2016 में तीसरा संस्करण भी प्रकाशित हुआ है।
1950 में पठानकोट में जन्मे भाई नीरज गोस्वामी पेशे से इंजीनियर हैं, जो पढ़ने-लिखने के साथ-साथ रंगमंच पर अभिनय के भी शौक़ीन हैं। इंटरनेट पर ख़ासे चर्चित रचनाकार हैं। और मज़ेदार बात ये है कि आप अपने ब्लॉग पर 'किताबों की दुनिया' नाम से पुस्तक-समीक्षा लिखते हैं, जिनकी संख्या अब तक लगभग सवा सौ हो चुकी है।
उर्दू हिंदी के धड़ों से अलग नीरज भाई आम हिंदुस्तानी ज़बान में अपने जज़्बात सादा-सरल लबो-लहज़े में शायरी के साँचों में ढालते हैं और यही आम ज़बान व सादा कहन ही इन्हें एक अलग पहचान देती है। इस किताब में हमें हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब की महक भी रह-रहकर महकाती रहती है।

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

पूरी किताब में कुल 119 ग़ज़लें शामिल हैं, इनमें से 6 ग़ज़लें होली पर और 4 ग़ज़लें मुम्बइया ज़बान में भी हैं। नीरज भाई शायरी में आम बातों को बड़े ही सलीक़े से कहते हैं कि ये सीधे दिल पर असर करती हैं। इनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी के हर पहलू पर शेर मिलेंगे। रिश्तों की टूटन, इंसानी फ़ितरत, अहसानफ़रामोशी, विकास के बदले चुकाई क़ीमत, ग्रामीण जीवन की झलक, बचपन की यादें और ऐसे ही बहुत सारे विषय इनकी शायरी की गिरफ़्त में आये हैं।

कभी बच्चों को मिलकर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब ज़िंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

पाँच करता है जो दो में दो जोड़कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

लूटकर जीने का आया दौर है
दान के किस्से पुराने हो गये

किताब में जगह जगह पर यथार्थ जीवन से परिचित कराते हुए, सीख देते हुए शेर देखने को मिल जायेंगे। आज के भयानक वातावरण में अलग-अलग झंडों के तले एक आम इंसान की जो सहमी सी हालत है, वो इस शेर के ज़रिये बा-ख़ूबी बयान होती है-

खौफ़ का ख़ंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आज का इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ

चारों तरफ भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी है। एक बेमक़सद की रेस है, जिसमें हम अपने इंसान होने तक के अहसास को भूलकर बस होड़ करने में लगे हैं। ऐसे में गीत, संगीत, कलाएँ आदि सब छूटती जा रही है हमसे। इस माहौल पर नीरज भाई कुछ यूँ नसीहत देते नज़र आते हैं-

दौड़ते फिरते रहें पर ये ज़रूरी है कभी
बैठकर कुछ गीत की, झंकार की बातें करें

सही तो है, संस्कृत के एक श्लोक में आचार्य भर्तुहरि द्वारा कहा गया है कि साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य साक्षात पशु के समान है-

साहित्यसङ्गीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:।


अपने कई अश'आर में ये हमें ज़िंदगी को खुलकर जीने का संदेश देते नज़र आते हैं। वाकई ज़िंदगी को खुलकर जीने का जो मज़ा है, वो नज़ारों को दूर से निहारने में कहाँ!!! तभी नीरज भाई कहते हैं-

खिड़कियों से झाँकना बेकार है
बारिशों में भीग जाना सीखिये

तौल बाज़ू, कूद जाओ इस चढ़े दरिया में तुम
क्यों खड़े हो यार तट पर ताकते लाचार से

ख़ुशबुएँ लेकर हवाएँ ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाएँगी
खोलकर तो देखो घर की बंद सारी खिड़कियाँ

नफ़रत भरे आज के माहौल में नीरज भाई के ऐसे बहुत से शेर आपको इस किताब में मिल जायेंगे, जो मोहब्बत और भाईचारे की पैरवी करते हैं। एक रचनाकार का ये फ़र्ज़ होता है कि वह आम लोगों को परदे के पीछे की बातों से अवगत कराए और दूरगामी अंदेशों से सावधान करे, यहाँ नीरज जी अपने इस फ़र्ज़ को बा-ख़ूबी अंजाम देते नज़र आते हैं-

तल्ख़ियाँ दिल में न घोला कीजिए
गाँठ लग जाए तो खोला कीजिए

अदावत से न सुलझे हैं, न सुलझेंगे कभी मसले
हटा तू राह के काँटें, मैं लाकर गुल बिछाता हूँ

तुम राख़ करो नफ़रतें जो दिल में बसी हैं
इस आग में बस्ती के घरों को न जलाओ

घर तुम्हारा भी उड़ाकर साथ में ले जायेंगी
मत अदावत की चलाओ मुल्क में तुम आंधियाँ

अपने कई अश'आर में ये सियासत की भी ख़बर लेते दिखते हैं-

सियासत मुल्क में शायद है इक कंगाल की बेटी
हर इक बूढ़ा उसे पाने को कैसे छटपटाता है

ये कैसे रहनुमा तुमने चुने हैं
किसी के हाथ के जो झुनझुने हैं

आ पलट देते हैं हम मिलके सियासत जिसमें
हुक्मरां अपनी रिआया से दगा करते हैं

ख़ुदा हर जगह, हर शय में मौजूद है, बस हम ही मूर्ख हैं जो उसे इधर-उधर ढूँढते फिरते हैं। अगर कभी गौर से हम उसे अपने अंदर ढूँढे तो वो यक़ीनन मुस्कुराते हुए हमसे ज़रूर मिलेगा। उसकी बनाई ख़ुदाई की सेवा ही उसकी बंदगी है। उसकी सबसे प्यारी सृजना इंसान से मोहब्बत ही उसकी पूजा है, लेकिन अफ़सोस कि हम यह बात समझ ही नहीं पाते। नीरज भाई अपने एक शेर में उस थाली को पूजा की थाली बताते हैं, जिसमें किसी भूखे को भोजन कराया गया हो....आह्हा! कितना उम्दा और दिल ख़ुश करने वाला ख़याल है। इसी तरह के भाव लिए कुछ और शेर भी हैं किताब में-

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
बस वही पूजा की थाली हो गयी

रब कभी कुछ नहीं दिया करता
रात-दिन घंटियाँ बजाने से

छाँव मिलती जहाँ दुपहरी में
वो ही काशी है वो ही मक्का है

वतन के लिए शहीद हुए वीरों की भावनाओं को भी ग़ज़लकार ने अपने इक शेर में कुछ यूँ पिरोया है-

देख हालत देश की रोकर शहीदों ने कहा
क्या यही दिन देखने को हमने दीं कुर्बानियाँ

और जवाब में हम सब शर्मिंदगी के साथ निरुत्तर हैं।

ग़ज़ल के वास्तविक अर्थ 'महबूब से गुफ़्तगू' को भी नीरज भाई ने बड़ी नफ़ासत के साथ शब्द दिये हैं। बहुत सारे ऐसे अश'आर हैं किताब में जिन्हें आप ज़हन से नहीं दिल से पढ़ना पसंद करेंगे। देखिये-

गीत तेरे जब से हम गाने लगे
हैं जुदा सबसे नज़र आने लगे

आईने में ख़ास ही कुछ बात थी
आप जिसको देख शरमाने लगे

ये हुई ना 'गुफ़्तगू' अपने 'महबूब' से....मतलब हुई ना ग़ज़ल! कुछ और अश'आर देखिये और फिर अपने दिल पर हाथ रखकर उसकी धड़कनें महसूस कीजिये-

तेरी यादें तितलियाँ बनकर हैं हरदम नाचतीं
चैन लेने ही नहीं देतीं कभी मरजानियाँ

ये तितलियों के रक्स ये महकी हुई हवा
लगता है तुम भी साथ हो अबके बहार में

हर अदा में तेरी दिलकशी है प्रिये
जानलेवा मगर सादगी है प्रिये

भोर की लालिमा चाँद की चांदनी
सामने तेरे फीकी लगी है प्रिये

एक जगह तो नीरज भाई नींद में भी कमाई कर लाते हैं। 'नींद में कमाई' क्या ख़याल लाये हैं भाई....वाह्ह्ह

ख्व़ाब देखा है रात में तेरा
नींद में भी हुई कमाई है

पूरी किताब ही इस तरह की उम्दा शायरी से सजी है। बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर बात की जा सकती है, बहुत से ऐसे मसअले हैं जिन पर चर्चा की जा सकती है। एक बहुत मजबूत पक्ष इस किताब का यह है कि इसमें शामिल सभी ग़ज़लें ग़ज़ल के व्याकरण के हिसाब से भी खरी हैं। अमूमन हिंदी की ग़ज़लों में शिल्पगत काफ़ी कमजोरियाँ मिलती हैं और यही फिलवक़्त हिंदी ग़ज़ल की सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन नीरज भाई सरीखे कुछ ग़ज़लकार हैं, जो ग़ज़ल के हुस्न में इज़ाफ़े के लिए कमर कसे हुए हैं। इन्होने कई जगह पर तत्सम शब्दों को भी बड़े सलीक़े से ग़ज़ल में बाँधा है तो साथ ही उर्दू के मुश्किल शब्दों को भी बहुत सहूलियत के साथ इस्तेमाल किया है। इस लिहाज़ से यह पुस्तक ग़ज़ल विधा के नए चेहरों के लिए बहुत उपयोगी है।

एक अच्छी, सफ़ल और चर्चित किताब के लिए बड़े भाई नीरज गोस्वामी को बहुत बहुत मुबारकबाद।





समीक्ष्य पुस्तक- डाली मोगरे की (ग़ज़ल संग्रह)
रचनाकार- नीरज गोस्वामी
संस्करण- सजिल्द, 2016 (तीसरा)
प्रकाशन- शिवना प्रकाशन, सीहोर (म.प्र.)
मूल्य- 150 रूपये