कहा जाता है कि साहित्य मितव्ययी होना चाहिए। बहुत कम शब्दों में रचना इतनी बोले कि उसके शब्दों की गूँज भीतर तक बस जाए और समय-समय पर गाहे-बगाहे ज़ेहन पर दस्तक देती रहे। ऐसा ही मितव्ययी प्रयास कविता संग्रह निनाद....गूँज प्रकृति की में देखने में आता है। यह कविता संग्रह जोधपुर (राज०) की कवयित्री एवं समालोचक डॉ० रेणुका श्रीवास्तव का पहला प्रकाशित संग्रह है, जिसमें इनकी कुल 65 छंदमुक्त कविताएँ संगृहीत हैं।
शीर्षक में प्रकृति का उल्लेख है, इसलिए कि कवयित्री को प्रकृति और उसके सभी अवयवों से विशेष स्नेह है। यह स्नेह इनकी कविताओं में भी जगह-जगह देखा जा सकता है, जब चाँदनी, बादल, बारिश, नदी, पेड़, पंछी सब इनकी अभिव्यक्ति में निरन्तर विचरते रहते हैं। प्रकृति के प्रति रचनाकार की संवेदनशीलता पुस्तक की 'अपनी बात' में भी देखी जा सकती है, जहाँ वे कहती हैं कि "मैं अपने घर में गमलों में ही कई तरह के पौधे लगाती थी, अब केवल गुलाब हैं क्योंकि मौसम बीत जाने पर जब वे पौधे सूख जाते तो मन बहुत उदास हो जाता"। मौसम बीत जाने पर 'पौधों का सूख जाना' देखकर विचलित होना रचनाकार के अतिसंवेदनशील मन की थाह देता है। कोई इसे अतार्किक कह सकता है लेकिन यही संवेदनशीलता एक सहृदय अथवा कवि के भीतर की वह नमी है, जिसने आग बरसाती दुनिया में रहने लायक छाँव तानी हुई है।
संग्रह में 'उदासी', 'रजनीगंधा', 'अमृत कलश', 'फिर वही कलकल', 'वृन्दा', 'चाँदनी', 'बारिश के बाद', 'चहचहाहट', 'ओस की बूँद' आदि कविताएँ प्रकृति के अनेक रूप, अनेक बिम्ब लिए हुए हैं। इन कविताओं में वे प्रकृति के सौन्दर्य से अभिभूत भी दिखती हैं तथा उसके संरक्षण के लिए चिंतित भी। इन प्रकृतिपरक कविताओं में कहीं चाँदनी अकेलेपन का एक आत्मीय साथी है, कहीं बारिश के बाद के कुछ सौंधे-से चार पल हैं, कहीं रोशनी से भरा आकाश है, कहीं चिड़िया की नर्म धूप के स्पर्श-सी चहचाहट है।
कविता 'ओस की बूँद' में प्रस्तुत एक नाज़ुक-सा बिम्ब देखिए, और रचनाकार की कला को सराहिए! प्रकृति के घटकों का मानवीकरण इस छोटी-सी कविता को कैसा जीवन्त किए देता है!
सुनो ओस की बूँद!
संभल के
धीरे
और धीरे
रखना पाँव,
गोद में फूल की
सोयी है
चाँदनी
जीवन की आपाधापी में सब कुछ हासिल कर लेने की होड़ लिए सालों-साल भागदौड़-मशक्कत में बिताकर एक लम्बे अरसे बाद ख़याल आता है कि हमने अपना आप तो जिया ही नहीं! जाने किस-किस के हिस्से का जी लिए लेकिन जिस ख़ुशी, जिस सुकून की चाह लिए जीवन-डगर पर निकले थे, वह तो मिली ही नहीं!
हर रोज़
सुबह की
भागदौड़ में
खोते जाते तुम
ख़ुद अपने को
भीड़ का हिस्सा बन
जीवन जीने की
मशक्कत करते
मगर
जी कहाँ पाते तुम!
'जीने की चाह' कविता के माध्यम से एक दृश्य रखने के बाद अपनी एक अन्य कविता के माध्यम से डॉ० रेणुका बताती हैं कि जो ख़ुशी नहीं मिली, वो कहाँ रह गयी-
खिल उठता है मन
देखकर
पौधों की नई कोंपल
किताब की इबारत
ओस की नन्हीं-सी बूँदें
जो बैठी हैं
इत्मीनान से
पत्तियों की नोंक पर,
कितना पहचाना-सा
अहसास
जिसे भूले रहे हम
बरसों
दरअसल जीवन की ख़ुशियाँ, उसका सुकून उन छोटे-छोटे पलों में था, जो हर रोज़ कई सौगातें लिए हमसे टकराते रहे। मगर अफ़सोस कि हम उस बड़े हासिल की चाह में रहे, जो हाथ से छिटका रहा। कुछ बड़ा बहुत-से छोटे-छोटों से मिलकर ही तो बनता है! यही समझ न पाये।
यही कविता है, यही कवि की मौजूदगी है दुनिया में, यही ब्रह्म-वाणी है, जो हमें बार-बार आगाह करती है, समझाती है। लेकिन समझ पाएँ तो, समझ आए तो!
जीवन की ऐसी समझ, जीवन के ऐसे सूत्र संग्रह की अनेक कविताओं में पिरोए मिलते हैं। 'इतिहास', 'शहर से दूर', 'स्वतंत्रता', 'सुख', 'ज़रूरत और ख़्वाहिश', 'पुण्यों का फल', 'कोशिश' और 'अटका पल' आदि कविताएँ इसी तरह की रचनाएँ हैं। इसी तरह की एक छोटी-सी कविता 'यादें' देखिए-
यादें
महकते हार के धागे-सी
फूल झड़ने पर भी
रह जाती बाक़ी जहाँ
ख़ुशबू।
बंधनों से बद्ध जीवन की बजाय स्वतंत्र तथा स्वाधीन जीवन हज़ार दुखों, लाखों अभावों के बावजूद कितना सुखद होता है, कवि के शब्दों में देखिए-
स्वतंत्र होना
कितना मनभावन!
अनुश्रुति नहीं ये कोई
प्रसन्नता से आच्छादित
जैसे
स्वर्ण कमलों से परिपूर्ण
ये जीवन है,
धूप-छाँव के पश्चात भी
यहाँ
प्यार है,
मिठास है, गरिमा है
प्रेम भी मानव जीवन और समाज का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। एक ऐसा उपहार, जो जीने की- मुस्कुराते रहने की अनगिन वजहें निर्मित करता है। इस संग्रह की कविताओं में भी यदा-कदा प्रेमिल भावनाएँ शब्दों में गुँथी हुई मिलती हैं। 'ख़ुशबू तुम्हारी', 'अहसास', 'जीवन महोत्सव' ऐसी ही प्रेम-पगी रचनाएँ हैं। कविता 'जीवन महोत्सव' देखें-
समय
हर दिन
नया रूप लिए
साथ हो,
भर देते उत्साह से तुम,
सच कर
छोटे-छोटे सपने
बना देते
जीवन महोत्सव
तुम
एक महिला रचनाकार महिला-मन और उसकी परिस्थितियों को अन्य लेखकों से बेहतर समझ सकता है, इसमें किसे संदेह होगा! भावनाएँ जब ख़ुद के ही अनुभवों से सिक्त हों तो उनका रंग, उनका असर और गाढ़ा होता है। डॉ० रेणुका की काव्यात्मक अभिव्यक्ति में एक स्त्री का संसार तथा उस संसार की तमाम उठापटक स्पष्टत: देखी जा सकती है। कविता 'अस्तित्व नदी-सा' में जहाँ नदी के प्रतीक के माध्यम से एक महिला का पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच स्वयं के अस्तित्व को विलीन कर देना दर्शाया गया है, वहीं 'जन्मदाता' शीर्षक कविता में बेटी के पैदा होने पर पिता की कठिनाइयाँ बढ़ जाने जैसी समाज की विकृत सोच पर कटाक्ष किया गया है। कविता 'रमिया' में बाल-विवाह तथा असमय विधवा हुई स्त्री के जीवन का अभिशापित जीवन दर्ज हुआ है तो 'ऊँची उड़ान' कविता में सपनों को मारकर चहारदीवारी में क़ैद की गयी अनेक प्रतिभाशाली, स्वप्नदर्शी महिलाओं की करुण कथा का अंकन है।
आह्ह! कितना परिवर्तन
खोकर
मीठा स्वभाव अपना
बन खारा जल
खो चुकी अस्तित्व अपना
****
उड़ना चाहती थी
वो भी उन्मुक्त
अपनी तय की गयी
दिशा की ओर
अपने वजूद को
देना चाहती थी नया आयाम
भर देना चाहती थी
हर ख़ुशरंग
अब खो गयी
हर दिशा
अब तो
क़ैद है पिंजरे में
इनके अतिरिक्त सेल्फ-लव या ख़ुद की सार-संभाल जैसे नए ट्रेण्ड होते विषय भी रेणुका जी की कविताओं का कथ्य बनते हैं, स्मृतियाँ शब्दबद्ध होकर विगत को पुनर्जीवन देती हैं तो जीवन के संघर्ष भी चित्रित होकर प्रोत्साहन के सूत्र गढ़ते हैं। कुल मिलाकर डॉ० रेणुका श्रीवास्तव का यह प्रथम संग्रह उनके भावुक व सहृदय व्यक्तित्व का परिचय करवाता है, साथ ही एक प्रतिभासंपन्न तथा कल्पनाशील रचनाकार की झलक भी देता है। विषयों की विविधता लिए इस सफल कविता संग्रह के लिए रचनाकार बधाई तथा साधुवाद की पात्र हैं।
पुस्तक- निनाद....गूँज प्रकृति की
रचनाकार- डॉ० रेणुका श्रीवास्तव
संस्करण- प्रथम, 2021
प्रकाशन- बोधि प्रकाशन, जयपुर
पृष्ठ- 88 (पेपरबैक)
मूल्य- 120 रुपए

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