चंद क़तरे ओस के अम्बिकापुर (छ.ग.) के ग़ज़लकार देववंश दुबे का ग़ज़ल संग्रह है। देववंश दुबे अपनी ग़ज़लों से ग़ज़ल विधा के परंपरागत स्वरूप के परिपक्व रचनाकार जान पड़ते हैं। परंपरागत स्वरूप के साथ-साथ इनकी ग़ज़लों में समकालीनता की झलक भी बराबर देखी जा सकती है। इनकी शायरी का मुख्य विषय जीवन और उसके विभिन्न रूप हैं और कहन क्लासिकल अंदाज़ की। कुल-मिलाकर वे ग़ज़ल के मध्य-मार्गीय रचनाकार हैं, जो पारम्परिक लबो-लहजे को बरक़रार रखते हुए समकालीन विषयों को अपनी ग़ज़लों का वर्ण्य -विषय बनाते हैं।
हमारे दौर के प्रतिष्ठित ग़ज़ल-उस्ताद एवं ग़ज़लकार कृष्णकुमार 'नाज़' साहब उनके विषय में कहते हैं, "देववंश दुबे जी ने अपनी ग़ज़लों में जीवन के प्रत्येक पक्ष पर गहरी दृष्टि डाली है। उनके यहाँ देश भी है, समाज भी है, राजनीति भी है, प्रेम भी है, घर-परिवार भी है, मेहनत-मज़दूरी करता निर्धन वर्ग भी है, युवा भी हैं तथा जीवन-जगत से जुड़ी और भी कई बातें हैं।" ये 'सब बातें' इन्हें ग़ज़ल का समकालीन रचनाकार ठहराती हैं। लेकिन बावजूद इसके वे ग़ज़ल का मूल पैटर्न नहीं छोड़ते, उसे बनाए रखते हैं। ग़ज़ल की क्लासिकल कहन के इनके कुछ शेर देखकर आगे बढ़ते हैं-
ग़ज़ल सदियों की लम्बी यात्रा करते हुए अपने आपको निरन्तर अपडेट करती रही है और यही कारण है कि उर्दू काव्य में सबसे अधिक चर्चित विधा रही है। इस विधा के कितने-कितने प्रबुद्ध रचनाकार आये, जिन्होंने अपने दौर के जद्दोजहद भरे जीवन के अक्स अपनी शायरी में उतारे। आज भी यह काम बदस्तूर जारी है। देववंश दुबे जैसे ग़ज़लकार इस काम को और विस्तार दे रहे हैं।
देववंश जी की शायरी में इनका दौर भी स्पष्टत: झाँकता हुआ मिलता है। समय का बदलाव, संबंधों और परिवार में बिखराव, बढ़ती अश्लीलता, पर्यावरण का क्षय, हावी होता वैमनस्य और आपसी सद्भाव की ज़रूरत जैसे अनेक-अनेक समकालीन विषय इनके शेरों में देखे जा सकते हैं। वे जानते हैं कि 'रचना वही चिरायु होती है, जिसमें जीवन-मूल्य चमकते हैं। कोरी कल्पना के भरोसे जीवन-यात्रा संभव नहीं है।' उनके ये शेर, उनकी समझ की तस्दीक करते हैं-
प्रतीकात्मकता ग़ज़ल ही नहीं, हर प्रकार की कविता का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। ग़ज़ल कुछ और अधिक इशारों की जुबान कही जाती है। अपनी व्यंजनात्मकता के कारण ही यह काव्य-विधा लाखों-करोड़ों प्रशंसकों को अपना बनाए हुए है। ग़ज़ल का यह गुण देववंश जी के रचनाकार के पास भी मिलता है। वे बड़ी सफाई से इशारों में अपनी बात कह जाते हैं। बहुत ही सादगी और सरलता लिए ये शेर कैसी गहरी अभिव्यंजना छोड़ जाते हैं, देखिए-
जैसा कि नाज़ साहब का भी मानना है कि जीवन के विभिन्न रूप इनकी ग़ज़लों में देखे जा सकते हैं, ऐसे ही जीवन की समझ भी इनकी ग़ज़लों में बहुत स्पष्ट और पुख्ता है। इन्होने दुनिया और समय की रगों को बहुत बारीकी से महसूस किया है और उसी के दम पर जीवन के विभिन्न पहलुओं की परिभाषाएँ गढ़ी हैं। जीवन की ये समझ, ये परिभाषाएँ गाहे-बगाहे उनके शेरों में प्रतिबिंबित होती हैं। इनके ये कुछ शेर मानवीय जीवन के अलग-अलग शेड्स हमारे सामने रखते हैं-
रचनाकार अपनी रचनाओं में बार-बार अपने कालखण्ड की पुनर्रचना करता है। ऐसा करते हुए वह प्रयत्नशील रहता है कि वह जो ठीक नहीं है, उसे कैसा होना चाहिए था, यह दिखा सके। दिखा सके कि हमारे आसपास को, हमारी दुनिया को, हमारे समाज को जैसा होना था, वैसा कैसे बनाया जाए। अपने समय, अपने दौर की असंगतियों से टकराने के लिए निश्चित रूप से उत्साह की, ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। कविता या साहित्य अपनी शब्द-सम्पदा के ज़रिए उस ऊर्जा को उन हाथों तक पहुँचाने का काम करते हैं, जो विसंगत से टकराने का माद्दा रखते हों। देववंश जी के उत्साह से भरे ये शेर, इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं-
प्रेम ग़ज़ल विधा का एक बहुत अनिवार्य तत्व है। प्रेम वह बिंदु है, जहाँ से ग़ज़ल जैसी कल की नाज़ुक और आज की प्रखर विधा का आरम्भ होता है। कह दूँ कि जहाँ से जीवन तथा सृष्टि का आरम्भ होता है, तो भी ग़लत न होगा। यह ऐसा ज़रूरी घटक है, जिसके बिना किसी दौर का साहित्य 'कम्प्लीट' नहीं माना जाएगा। उस प्रेम जैसे शाश्वत विषय पर इस पुस्तक में कई उम्दा शेर पढ़ने को मिलते हैं। कुछ शेर देखें-
परम्परा और समकालीनता का गठजोड़, वर्तमान की सहज उपस्थिति, दुनिया व जीवन की ज़रूरी समझ, प्रेम तथा प्रोत्साहन का समावेश, अपने आसपास की भाषा में अपनी बातें, वे बिंदु हैं, जो संग्रह 'चंद क़तरे ओस के' को पठनीय बनाते हैं। यह संग्रह इर्तिका पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली से वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ है। यह रचनाकार देववंश दुबे जी का पहला ग़ज़ल संग्रह है, जिसमें उनकी कुल 96 ग़ज़लें संगृहीत हैं। इस संग्रह की बधाई के साथ उन्हें आगामी संग्रहों के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ।

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